मिश्रा-जी के स्वागत की तैयारियां हो चुकी थी। सावधानी के तौर पर कुछ नए कानून लागू किए गए थे, मसलन किसी भी तरह की यूनियन अथवा संगठन बनाने पर अनिश्चित काल के लिए रोक लगा दी गयी थी, मिश्रा-जी से दूरी बनाये रखने एवं स्वयं से वार्तालाप न शुरू करने के निर्देश दिए गए थे। मिश्रा-जी को इन सब नए कानून की ख़बर न लगने देने का भी प्रबंध कर दिया गया था। मिश्रा-जी उस बिन बुलाये अतिथि के समान थे, जिनकी खातिरदारी भी करनी पड़ती हैं और घर की शान्ति न भंग हो ऐसा प्रबंध भी करना पड़ता हैं। अंततः मिश्रा-जी भी आ पहुंचे।
मृत्यु के पश्चात भी उनके चेहरे का तेज कुछ कम नही हुआ था। सामान्यतया मृत प्राणी शोकग्रस्त लगते है, परन्तु मिश्रा-जी तो स्वाभाविक एवं आत्मविश्वास से भरे हुए लग रहे थे, मानो यह यात्रा उनके लिए एक internship के समान हो। यमराज ने उनके रहने के प्रबंध के बारे में बताते हुए कहा की, किन्ही अज्ञात कारणों से उन्हें यमलोक में ही कुछ समय गुजरना पड़ेगा। उनकी देखभाल के लिए शंखनाद और सिंघनाद को उनकी सेवा में नियुक्त कर दिया गया। मिश्रा-जी सब कुछ चाव से सुन रहे थे और रह-रह कर इधर-उधर के प्रशन भी पूछ रहे थे। मिश्रा-जी को आराम करने के लिए भेज कर यमराज ने चित्रगुप्त को बुला भेजा।
'यह प्राणी तो अत्यन्त सदाचारी प्रतीत होता हैं। मोह-माया से परे, सबका भला चाहने वाला एवं इतना मृदुभाषी प्राणी तो हमने विगत कई युगों में नही देखा। तुम्हे स्वयं उस से मिलकर अपना भ्रम दूर करना चाहिए चित्रगुप्त।', यमराज को मिश्रा-जी पर कोई शक नही था।
'सावधान महराज! ऍम बी ऐ नामक कुटिल माया के छल से सावधान। वाक्-पटुता तो इस विधा की प्रथम आवश्यकता हैं। मुझे पहले ही अंदेशा था की वह प्राणी सबसे पहले आपको अपने वश में करने का प्रयास करेगा। उसके सम्मोहन से स्वयं को बचाने के लिए ही मैंने उसके सामने आना उचित नही समझा।'
यमराज को चित्र-गुप्त की ही बात माननी पड़ी। चित्र-गुप्त के अनुसार, मिश्रा-जी सभी यमदूतो को बहका-कर कोहराम खड़ा कर सकते हैं। यदि सभी यमदूत अपना कार्य छोड़ कर हड़ताल पर बैठ जाए, तो यमलोक में तो हाहाकार मच जाएगा। इसीलिए नए नए कानून बनाये गए थे।
कुछ ही दिनों में मिश्रा-जी तो जैसे यमराज के गहरे मित्र हो गए। मिश्रा-जी प्रतिदिन सिंघनाद और शंखनाद के साथ यमलोक के विभिन्न विभागों के भ्रमण के लिए जाते, और वापिस आकर यमराज से इन सब विभागों की कार्य-प्रणाली की प्रंशसा करते। लेखा-जोखा विभाग, यमदूत नियंत्रण विभाग, स्वर्ग-नरक विभाग इत्यादि सभी विभागों की कार्य प्रणाली का गहन विश्लेषण मिश्रा-जी ने कुछ ही दिनों में कर लिए था। यमराज से विचार-विमर्श के दौरान मिश्रा-जी कार्य-प्रणाली सम्बन्धि गहन प्रशन पूछते और यमराज प्रसन्नतापूर्वक उन प्रशनो का समाधान करते।
जहाँ एक और मिश्रा-जी की सदाचारिता में यमराज का विश्वास बढता जा रहा था, वही चित्रगुप्त की चिंता भी दिन रात बढती जा रही थी। उनके सभी अन्देशो को मिश्रा-जी एक एक करके झुठला चुके थे। ना तो उन्होंने कभी यमदूतो के संगठन का प्रयास किया, और ना ही किसी और प्रकार का उत्पात मचाने का प्रयास किया। जो भी उनसे मिलाता, उनकी सदाचारिता और बुद्धिमता के गुणगान करने लगता। उनके चहरे से किसी को भी किसी प्रकार की कुटिलता की भनक न लगी। यमराज के साथ मिश्रा-जी के दैनिक विचार-विमर्श के दौरान भी उन्होंने कभी किसी भी विभाग की कार्य-प्रणाली पर कोई शक नही किया। सभी में पूर्ण निष्ठां जताते हुए, प्रबंध की खुले दिल से प्रशंसा ही की।
एक दिन यमराज, मिश्रा-जी से गहन चर्चा में लगे थे तो अनायास ही उन्होंने मिश्रा-जी से पूछा की उन्हें कौनसा विभाग सबसे ज्यादा अच्छा लगता है?
मिश्रा-जी ने कुछ सोचकर उत्तर दिया, 'लेखा-जोखा विभाग', और वह उसकी कार्यप्रणाली की फिर से प्रशंसा करने लगे।
यमराज ने मन-ही-मन सोचा की, इसी विभाग के कारण, मिश्रा-जी को जीवन एवं मृत्यु के बीच यह समय गुजरना पड़ रहा है, और यह निर्दयी प्राणी इसी विभाग की प्रशंसा किए जा रहा हैं। अब तो यमराज को पूरा भरोसा हो गया था की, यह प्राणी एक सदाचारी है, एक निर्दयी प्राणी, जो भले मन से सबका हितेषी हैं। उसका बुरा करने वाले विभाग की भी यह इतनी प्रशंसा कर रहा हैं। तभी उन्हें मिश्रा-जी के ज्ञान का ध्यान आया। चित्रगुप्त के अनुसार ऍम बी ऐ तो अत्यन्त प्रभावशाली एवं कुटिल ज्ञान हैं, परन्तु यह प्राणी तो निरा निर्दोष प्रतीत होता हैं। 'तो क्यूँ न इस अनोखी विद्या का कुछ लाभ उठाया जाए', यह सोचते हुए यमराज ने मिश्रा-जी से प्रशन किया,
'मिश्रा-जी! क्या आप हमे एक कमी बता सकते है यमलोक की कार्य-प्रणाली की? कुछ सुझाव जो यहाँ की कार्यप्रणाली को और भी अधिक प्रभावशाली बना सके।'
मिश्रा-जी गहन सोच में डूब गए। यह तो उनके ज्ञान की परख थी। अत्यन्त सोच-विचार के बाद उन्होंने सुझाव दिया की, यमदूत को प्रथ्वी एक निर्धारित भाग न देकर, आवश्यकता के अनुसार कार्य सौंपा जाना चाहिए। कुछ ही दिनों पहले प्रथ्वी पर एक भयानक भूकंप आया था, और उस क्षेत्र विशेष की यमदूतो पर अत्यन्त कार्य-भार आ गया था, अन्य क्षेत्रो के यमदूतो की सेवाए उस समय ली जा सकती थी। मिश्रा-जी के लिए, यह एक सीधा-साधा Resource Management का प्रशन था। उन्हें यमदूत वितरण की प्रणाली को Pizza-Hut के delivery boys से model करने में ज्यादा समय नही लगा। उन्होंने यमराज को समझाते हुए बताया की, वर्तमान यमदूत वितरण प्रणाली समाचार-पत्र वितरण प्रणाली के समान ही अविचल है। यदि इसमे आवश्यकता के अनुसार परिवर्तन किए जाए, तो संसार से मृत प्राणियों को शीघ्र अति शीघ्र स्वर्ग अथवा नरक भिजवाया जा सकेगा।
यमराज को भी सीधी गणित समझाते देर न लगी, और उन्हें मिश्रा-जी की योग्यता पर भी अटल विश्वास हो चला। ऍम बी ऐ की क्षमताओ को उन्होंने अकारण ही विधवंसकारी मान लिया था, उन्हें तो इन सबका प्रयोग करना चाहिए। धीरे धीरे उन्हें लगने लगा की परम-पिता ने मिश्रा-जी को यमलोक के उत्थान के लिए ही भेजा हैं। बस फिर क्या था, चित्रगुप्त के लाख समझाने के बाद भी, मिश्रा-जी यमराज के प्रमुख सलाहकार बन गए।
मिश्रा-जी की सलाह देना का सिलसिला थमा नही। अभी कुछ ही दिनों पहले तक, यमलोक की कार्यप्रणाली की प्रशंसा करते नही थकने वाले मिश्रा-जी, अब नए नए सुझाव दे रहे थे। यमराज के कहने पर उन्होंने प्रत्येक विभाग का विश्लेषण करके विस्तार से अपने सुझाओ को रखना शुरू किया। यमदूतो के लिए shifts का प्रावधान लाया गया, प्रत्येक यमदूत के लिए एक अलग भेंसे का प्रबंध किया गया, एक मृत प्राणी को लाने के लिए एक से अधिक यमदूत के जाने पर रोक लगी इत्यादि इत्यादि। यह सभी सुझाव मिश्रा-जी ने वहाँ की कार्य प्रणाली को देखते हुए ही किए थे। उन्हें अब तक याद था की उन्हें लाने के लिए दो यमदूत आए थे, जबकि यह कार्य एक यमदूत ही कर सकता था।
मिश्रा-जी के सुझावों से किसी को कोई हानि नही उठानी पड़ी, वरन सभी कार्य समय से पूर्व ही होने लगे। अब तो धीरे धीरे चित्रगुप्त को भी विश्वास होने लगा था की मिश्रा-जी से यमलोक को कोई खतरा नही हैं। जब वह स्वयं मिश्रा-जी से मिले तो उन्हें भी कुटिलता की कोई झलक दिखायी नही दी। परन्तु रह रह कर उनके मन में अन्देशो का बवंडर आता रहता था। (अगले अंक में समाप्त....)
Wednesday, April 22, 2009
Thursday, March 5, 2009
मिश्रा जी M. B. A.
अपनी आखिरी साँसे लेते रोहन मिश्रा रह रह कर कमरे के दूसरी और दो भयावह आक्रतिया देख रहे थे। कभी उन्हें यह मात्र एक भ्रम लगा तो कभी अपने सर पर मंडराती मौत का साया। अपने जीवन में कभी उन्हें किसी प्रकार के भ्रम का सामना नही करना पड़ा। एकाग्र मन और मजबूत इच्छा-शक्ति के स्वामी, मिश्रा-जी ने जो चाहा वो पाया। सफल व्यापार और प्रभावशाली मित्रगन वाले मिश्रा-जी का यह दुर्भाग्य ही कहा जाएगा की पेंतीस वर्ष की अल्पायु में ही उन्हें एक जानलेवा दुर्घटना का सामना करना पड़ा। यह संसार मिश्रा-जी की बुद्धिमता से वंचित ही रह जाएगा, उनकी मृत्यु किसी भी क्षण निश्चित हैं।
जहाँ अपनी मृत्यु शय्या पर भी मिश्रा-जी अपनी इच्छा-शक्ति का परिचय दे रहे थे, वही दूसरी ओर उसी कमरे के दुसरे छोर पर खड़े दो यमदूत, शंखनाद और सिंघनाद, उनकी अन्तिम साँसों की बाट जोह रहे थे। सिंघनाद के लिए एक एक क्षण प्रतीक्षा करना भारी पड़ रहा था परन्तु शंखनाद तल्लीनता से मिश्रा-जी द्वारा जुटाए सांसारिक भोग की वस्तुओं को निहार रहा था।
'इस सांसारिक जीव ने बहुत प्रसिद्दि एवं धन कमाया है। यह निश्चय ही एक प्रभावशाली व्यक्तित्व का स्वामी हैं। इसकी मृत्यु के प्रश्चात यह संसार दुःख में डूब जाएगा।', शंखनाद ने चुप्पी तोड़ते हुए कहा।
'यह संसार कभी किसी का सगा नही हुआ है भ्राते! इस जीव की साँसों के समान ही इसके द्वारा अर्जित किया हुआ धन, मान और यह सांसारिक वैभव मिटटी में मिल जाएगा।', सिंघनाद की दर्शिकनिकता में भी खीज की बू आ रही थी। मिश्रा जी दम-तोड़ने का नाम ही नही ले रहे थे।
'देखना मेरा कथन सत्य प्रमाणित होगा। यह संसार शोकाकुल होकर त्राहि-त्राहि करेगा।'
'यह तो समय ही बताएगा की कौन-सत्य है।', यह कहते हुए, सिंघनाद ने शर्त लगाने का प्रस्ताव रखा। मिश्रा-जी तो अब मरे या तब, कम से कम यमदूतो के मनोरंजन का ही कुछ जुगाड़ हो। जब शंखनाद ने इस शर्त को जीवन-मृत्यु पर एक उपहास बताया तो, सिंघनाद को उसे समझाते देर नही लगी की, यह निरा मानव भी तो धरम की आड़ में क्या क्या गुल खिलाता है। कभी नैतिक मूल्यों का माखोल उडाता है तो कभी ईश्वर का, ऐसे में इस तुच्छ सी शर्त से भला कौन सा पहाड़ टूट पड़ेगा, और कुछ अनहोनी हुई भी नही। थोडी ही देर में मिश्रा-जी के प्राण-पखेरू उड़ गए। मिश्रा-जी की आत्मा के साथ सिंघनाद और शंखनाद ने यमलोक की और प्रस्थान किया। इस प्रकार धरती पर आकर आत्माए लाने का कार्य तो वो युग युग से कर रहे थे, परन्तु उन्हें इस बात का तनिक भी ज्ञान नही था की इस बार वो एक मुसीबत को अपने साथ ले जा रहे हैं।
यमलोक में कुछ दूसरा ही दृश्य चल रहा था। अपने स्वर्ण सिंहासन पर यमराज विचारमग्न मुद्रा में बैठे थे। उन्ही की बगल में अपना लेखा-जोखा लिए चित्रगुप्त खड़े थे। मुद्दा कोई मामूली मुद्दा नही था। चार युगों में पहली बार ऐसा हुआ था की चित्रगुप्त को अपने लेखे-जोखे पर संदेह हुआ हो। आज तक जैसा लेखे-जोखे ने हिसाब लगाया, वैसा सबको फल मिला। संसार के एक एक प्राणी के कर्मो का हिसाब इस लेखे-जोखे में विस्तार से रखा गया था। किसी भी प्राणी की मृत्यु पर उसके द्वारा किए गए कर्मो के हिसाब से उसे स्वर्ग अथवा नरक में जाना होता था। आज तक इस हिसाब में न तो कोई गड़बड़ हुई और न ही किसी को तिल-मात्र का भी संदेह, परन्तु आज परस्थिति विकत थी। चित्रगुप्त स्वयं अपने लेखे-जोखे के विपरीत जाना चाहते थे, और यमराज इसके विरुद्ध थे। सभी फसाद की जड़ थी, मिश्रा-जी की आत्मा जो किसी भी क्षण यमलोक पहुँच सकती थी।
हिसाब के अनुसार तो मिश्रा-जी ने कभी कोई दुष्कर्म नही किया था। सभी प्रकार से सांसारिक व्यसनों से मुक्त सफल और शांत जीवन जीने वाले को चित्र-गुप्त का मन स्वर्ग भेजने को गंवारा नही हो रहा था। यमराज को इसके पक्ष में कोई प्रमाण नही मिल रहा था।
'यहाँ इस जीव के खाते में कोई पाप नही लिखा है चित्रगुप्त!', यमराज ने फिर से वही प्रशन दोहराया जिसका कोई संतोषजनक उत्तर उन्हें अभी तक नही मिला था।
'महाराज! उसे कभी कोई पाप करने का समय ही नही मिला। वह बड़ी तल्लीनता से अपने तरकश में जहरीले बाण संजो रहा था। मुझे इस बात में कोई संदेह नही हैं की, यदि इस प्राणी को धरती पर कुछ वर्ष और जीवत रहेने दिया जाता तो प्रलय मच सकता था।', मिश्रा-जी की अल्पायु में मृत्यु की गुत्थी अभी तक सबके लिए एक पहली बनी हुई थी। चित्रगुप्त इसे परम-पिता का गुप्त संदेश मान रहे थे तो यमराज मात्र एक संयोग।
'ऐसी कौन सी विद्या अर्जित की है इस प्राणी ने?'
'महाराज! संसार में इस विद्या को ऍम बी ऐ के नाम से जाना जाता हैं। यूँ तो भेड़-चाल से प्रभावित होकर समाज का एक बड़ा वर्ग इस विधा को अर्जित करता है, परन्तु रोहन मिश्रा जैसे कुछ ही प्राणी इसकी अलोकिक एवं विनाशकारी शक्तियों के सच्चे स्वामी बन पाते हैं। साधारण सा दिखने वाला यह ज्ञान मानव मात्र में चाणक्य की कुटिलता, सूर्य सा तेज, शकुनी की वाक्-पटुता और रावण सा दुसाहस भर देता हैं। एक सामान्य प्राणी तो इस डिग्री से मिलने वाली नौकरी की चकाचोंध में समस्त शक्तियों को अर्जित करने से चुक जाता हैं, परन्तु यह जीव तो पूर्णतः पारंगत हो चुका है। संभवतया पृथ्वी को विनाश से बचाने के लिए ही परम-पिता ने इस जीव को अल्पायु में मृत्यु का श्राप दिया है।', चित्रगुप्त ने फिर से अपना पक्ष रखा।
कुछ देर तक सोच-विचारने के बाद यमराज ने कहा, 'यह श्राप है या वरदान यह तो समय ही बताएगा, परन्तु हम स्वर्ग-लोग की शान्ति के साथ किसी भी प्रकार का खिलवाड़ नही कर सकते। ना ही हम इस जीव को बिना कोई पाप किए नरक-लोक में भेज सकते है। अतः इसे यमलोक में ही कुछ समय तक रखा जाए। जब तक इसका भविष्य निर्धारित नही होता हैं, हमे ही इसकी पूर्ण जिम्मेदारी लेनी होगी।', यमराज अपना निर्णय सुना चुके थे। (... क्रमशः)
जहाँ अपनी मृत्यु शय्या पर भी मिश्रा-जी अपनी इच्छा-शक्ति का परिचय दे रहे थे, वही दूसरी ओर उसी कमरे के दुसरे छोर पर खड़े दो यमदूत, शंखनाद और सिंघनाद, उनकी अन्तिम साँसों की बाट जोह रहे थे। सिंघनाद के लिए एक एक क्षण प्रतीक्षा करना भारी पड़ रहा था परन्तु शंखनाद तल्लीनता से मिश्रा-जी द्वारा जुटाए सांसारिक भोग की वस्तुओं को निहार रहा था।
'इस सांसारिक जीव ने बहुत प्रसिद्दि एवं धन कमाया है। यह निश्चय ही एक प्रभावशाली व्यक्तित्व का स्वामी हैं। इसकी मृत्यु के प्रश्चात यह संसार दुःख में डूब जाएगा।', शंखनाद ने चुप्पी तोड़ते हुए कहा।
'यह संसार कभी किसी का सगा नही हुआ है भ्राते! इस जीव की साँसों के समान ही इसके द्वारा अर्जित किया हुआ धन, मान और यह सांसारिक वैभव मिटटी में मिल जाएगा।', सिंघनाद की दर्शिकनिकता में भी खीज की बू आ रही थी। मिश्रा जी दम-तोड़ने का नाम ही नही ले रहे थे।
'देखना मेरा कथन सत्य प्रमाणित होगा। यह संसार शोकाकुल होकर त्राहि-त्राहि करेगा।'
'यह तो समय ही बताएगा की कौन-सत्य है।', यह कहते हुए, सिंघनाद ने शर्त लगाने का प्रस्ताव रखा। मिश्रा-जी तो अब मरे या तब, कम से कम यमदूतो के मनोरंजन का ही कुछ जुगाड़ हो। जब शंखनाद ने इस शर्त को जीवन-मृत्यु पर एक उपहास बताया तो, सिंघनाद को उसे समझाते देर नही लगी की, यह निरा मानव भी तो धरम की आड़ में क्या क्या गुल खिलाता है। कभी नैतिक मूल्यों का माखोल उडाता है तो कभी ईश्वर का, ऐसे में इस तुच्छ सी शर्त से भला कौन सा पहाड़ टूट पड़ेगा, और कुछ अनहोनी हुई भी नही। थोडी ही देर में मिश्रा-जी के प्राण-पखेरू उड़ गए। मिश्रा-जी की आत्मा के साथ सिंघनाद और शंखनाद ने यमलोक की और प्रस्थान किया। इस प्रकार धरती पर आकर आत्माए लाने का कार्य तो वो युग युग से कर रहे थे, परन्तु उन्हें इस बात का तनिक भी ज्ञान नही था की इस बार वो एक मुसीबत को अपने साथ ले जा रहे हैं।
यमलोक में कुछ दूसरा ही दृश्य चल रहा था। अपने स्वर्ण सिंहासन पर यमराज विचारमग्न मुद्रा में बैठे थे। उन्ही की बगल में अपना लेखा-जोखा लिए चित्रगुप्त खड़े थे। मुद्दा कोई मामूली मुद्दा नही था। चार युगों में पहली बार ऐसा हुआ था की चित्रगुप्त को अपने लेखे-जोखे पर संदेह हुआ हो। आज तक जैसा लेखे-जोखे ने हिसाब लगाया, वैसा सबको फल मिला। संसार के एक एक प्राणी के कर्मो का हिसाब इस लेखे-जोखे में विस्तार से रखा गया था। किसी भी प्राणी की मृत्यु पर उसके द्वारा किए गए कर्मो के हिसाब से उसे स्वर्ग अथवा नरक में जाना होता था। आज तक इस हिसाब में न तो कोई गड़बड़ हुई और न ही किसी को तिल-मात्र का भी संदेह, परन्तु आज परस्थिति विकत थी। चित्रगुप्त स्वयं अपने लेखे-जोखे के विपरीत जाना चाहते थे, और यमराज इसके विरुद्ध थे। सभी फसाद की जड़ थी, मिश्रा-जी की आत्मा जो किसी भी क्षण यमलोक पहुँच सकती थी।
हिसाब के अनुसार तो मिश्रा-जी ने कभी कोई दुष्कर्म नही किया था। सभी प्रकार से सांसारिक व्यसनों से मुक्त सफल और शांत जीवन जीने वाले को चित्र-गुप्त का मन स्वर्ग भेजने को गंवारा नही हो रहा था। यमराज को इसके पक्ष में कोई प्रमाण नही मिल रहा था।
'यहाँ इस जीव के खाते में कोई पाप नही लिखा है चित्रगुप्त!', यमराज ने फिर से वही प्रशन दोहराया जिसका कोई संतोषजनक उत्तर उन्हें अभी तक नही मिला था।
'महाराज! उसे कभी कोई पाप करने का समय ही नही मिला। वह बड़ी तल्लीनता से अपने तरकश में जहरीले बाण संजो रहा था। मुझे इस बात में कोई संदेह नही हैं की, यदि इस प्राणी को धरती पर कुछ वर्ष और जीवत रहेने दिया जाता तो प्रलय मच सकता था।', मिश्रा-जी की अल्पायु में मृत्यु की गुत्थी अभी तक सबके लिए एक पहली बनी हुई थी। चित्रगुप्त इसे परम-पिता का गुप्त संदेश मान रहे थे तो यमराज मात्र एक संयोग।
'ऐसी कौन सी विद्या अर्जित की है इस प्राणी ने?'
'महाराज! संसार में इस विद्या को ऍम बी ऐ के नाम से जाना जाता हैं। यूँ तो भेड़-चाल से प्रभावित होकर समाज का एक बड़ा वर्ग इस विधा को अर्जित करता है, परन्तु रोहन मिश्रा जैसे कुछ ही प्राणी इसकी अलोकिक एवं विनाशकारी शक्तियों के सच्चे स्वामी बन पाते हैं। साधारण सा दिखने वाला यह ज्ञान मानव मात्र में चाणक्य की कुटिलता, सूर्य सा तेज, शकुनी की वाक्-पटुता और रावण सा दुसाहस भर देता हैं। एक सामान्य प्राणी तो इस डिग्री से मिलने वाली नौकरी की चकाचोंध में समस्त शक्तियों को अर्जित करने से चुक जाता हैं, परन्तु यह जीव तो पूर्णतः पारंगत हो चुका है। संभवतया पृथ्वी को विनाश से बचाने के लिए ही परम-पिता ने इस जीव को अल्पायु में मृत्यु का श्राप दिया है।', चित्रगुप्त ने फिर से अपना पक्ष रखा।
कुछ देर तक सोच-विचारने के बाद यमराज ने कहा, 'यह श्राप है या वरदान यह तो समय ही बताएगा, परन्तु हम स्वर्ग-लोग की शान्ति के साथ किसी भी प्रकार का खिलवाड़ नही कर सकते। ना ही हम इस जीव को बिना कोई पाप किए नरक-लोक में भेज सकते है। अतः इसे यमलोक में ही कुछ समय तक रखा जाए। जब तक इसका भविष्य निर्धारित नही होता हैं, हमे ही इसकी पूर्ण जिम्मेदारी लेनी होगी।', यमराज अपना निर्णय सुना चुके थे। (... क्रमशः)
Thursday, February 26, 2009
पप्पू की प्रेम-कथा
बंद अंधेरे कमरे में पप्पू अपने पलंग पर लेटा न जाने कौनसे खयालो में डूबा था। रात थी जो कटने का नाम नही ले रही थी और कमबख्त सुबह आने का। करवटे बदलते बदलते पप्पू ने पिछली कई राते काटी थी, परन्तु यह रात तो मानो द्रोपदी के चीर के समान खिचती ही चली जा रही थी। खिसियाते हुए उसने फिर से अपने सेल-फ़ोन पर समय देखा और अंदाजा लगाया की अभी भोर होने में बहुत समय शेष हैं। थक-हार कर पुनः सोने के निरथर्क प्रयास करने से पूर्व उसने सेल-फ़ोन का अलार्म चेक किया, कहीं उसकी आँख न लग जाए और वो सोता ही रह जाए। इस दिन को वो भला कैसे भूल सकता हैं। १४ फ़रवरी यूँ तो एक सामान्य दिन ही है, जिस दिन न देश आजाद हुआ गया था और न ही सविधान लिखा गया था। फिर भी इस दिन का महत्व किसी भी नौजवान के लिए उतना ही है, जितना किसी स्वंत्रता सेनानी के लिए पन्द्रह अगस्त का। वैलेंटाइन दिवस को समस्त संसार में प्यार की याद में मनाया जाता हैं। प्रेमी युगल अपने प्रेम का इजहार करते हैं, साथ में समय बिताते है और खुशिया मनाते हैं। इस दिन की बात ही कुछ निराली है।
भोर होने की आस में रोशनदान पर नजर गडाए पप्पू पुनः विचारो के भंवर-जाल में खो गया। इसी दिन का तो वह पिछले एक सप्ताह से प्रतीक्षा कर रहा था। यदि यह कहा जाए की इस दिन का इन्तजार उसे कई महीनो से था तो भी अतिशयोक्ति न होगी। कॉलेज में प्रथम वर्ष तो सेनिअर्स की सेवा और रैगिंग में ही निकल गया। कब परीक्षाये आई और कब चली गया, पता ही नही चला। प्रारम्भ में अनजाना लगने वाला यह हॉस्टल और नया शहर मानो उसके जीवन के अभिन्न अंग हो गए। सकुचाते हुए अनजान लोगो से बातचीत का सिलसिला एक बार आरम्भ हुआ तो पूरे हॉस्टल की दोस्ती के बाद ही रुका। बंगाल वाला भट्ट हो या दिल्ली का शर्मा, अब तो सब उसके मौज मस्ती के साथी बन चुके थे। सबने मिलजुल कर अध्ययन भी किया तो मस्ती भी खूब मारी, परन्तु लड़कियों के मामले में बेचारा पप्पू पिछड़ गया। भला लखीमपुर जैसे छोटे से गाँव में कहाँ उसे 'को-एड' का सोभाग्य मिलाता? जहाँ उसके कॉलेज के मित्रगन अपने स्कूल के समय से ही 'अस-ऍम-अस' की दिव्य शक्तियों से अवगत थे, वहाँ बिचारे पप्पू को तो इन सब हथकंडो की भनक भी नही थी। इसका यह अभिप्राय नही हैं की कभी पप्पू ने किसी लड़की की तरफ आँख भी उठाकर नही देखा, बस कभी बात-चित का मौका नही मिला।
कॉलेज में अध्ययन के दौरान उसने बहुत कुछ सिखा, फिर भी अपने रसिक मित्रो की बराबरी कहाँ कर पाता। हॉस्टल की मस्ती के साथ साथ उसके मित्रगन कॉलेज के बगल के पुष्प-उद्यान में भी समय बिताते थे, शहर के बाहर के थिएटर में अपनी गर्ल-फ्रिएंड्स के साथ सिनेमा देखते थे, और बेचारा पप्पू मन ही मन कुडता रहता था। एक अदद लव स्टोरी बनाने के उसने भी भरसक प्रयास किए। कभी डांस सीखने के बहाने से तो कभी नोट्स लेने के बहाने से, जब भी उसने किसी सुंदरी से संपर्क करना चाहा, तो मानो जुबान को सांप डस गया। शब्द रुक गए, धड़कन बढ गई और पसीना छुटने लगा।
पप्पू के दोस्तों ने भी कई यतन किए। उसे सिनेमा दिखाया, किसी भी लड़की से बात करने के लिए वार्तालाप लिख के दिए, हॉस्टल में प्रयोग करवाए, परन्तु हाय रे फूटी किस्मत, पप्पू का संकोच जस का तस् रहा। थक हार कर सबने उसे उसके हाल पर छोड़ दिया और अपने अपने जीवन में व्यस्त हो गए। एक बार फिर से यह शहर उसके लिए पराया हो गया।
अचानक पप्पू के भावनाओ का प्रवाह बाहर से आने वाले शोर से टूटा। लगता है जैसे पूरा हॉस्टल करवटो में रात काट रहा हैं और भोर की पहली किरण की राह देख रहा हैं। हॉस्टल के बाकी लोगो का ख़याल आते है उसने तुंरत उठने का निश्चय किया। उसके पुराने मित्र अब उसके मित्र कहाँ रहे थे, सभी अपने अपने जीवन में अपनी अपनी गर्ल-फ्रिएंड्स के साथ व्यस्त थे। इससे पहले की उसे फिर से न चाहते हुए भी शर्मा और भट्ट से नजर मिलनी पड़े, उसने मुहं अंधेरे ही हॉस्टल से निकल जाना उचित समझा।
इस तरह सबसे नज़रे छिपाए हॉस्टल से निकल जाना भी अब तो नया नही था। पप्पू के गहरे दोस्त भट्ट और शर्मा की प्रेम कहानिया दिन दुगनी रात चोगनी तरक्की कर रही थी। वो दोनों ही अब अपना समय अपनी-अपनी प्रेमिकाओ के साथ ज्यादा बिताते थे। जब भी उन्होंने पप्पू को साथ में ले जाकर अपनी प्रेमिकाओ से मिलवाना चाहा, पप्पू का लड़कियों के प्रति भय राह का रोड़ा बन गया। धीरे धीरे पप्पू के सबसे अच्छे दोस्त ही उसका मजाक उडाने लगे। 'Pappu can't dance saala' गाने ने तो जैसे आग में घी का काम किया। जिसे देखो वह पप्पू को देख कर यही गाना गाता, और बेचारा पप्पू चाह कर भी कुछ नही कर पाता। कभी अपने आप को अपने कमरे में बंद किया तो कभी लाइब्रेरी में, परन्तु इस तनाव ने कभी उसका साथ नही छोडा।
इसी उधेड़-बुन में वह बहुत दूर आ गया था। हॉस्टल भी पीछे छूट गया और भयावह अंधकार भी। सुहानी पवन से अठखेलिया करती सूर्य की प्रथम किरणे अलोकिक ऊर्जा का संचार कर रही थी। रात्रि के घोर अंधेरे से निकल कर मानो सभी पेड़-पौधे और जीव-जन्तु अटल श्रद्धा के साथ सात अश्वो के रथ पर व्योम की सेर करने वाले सूर्य देव की स्तुति कर रहे थे। पक्षी अपने घोंसलों को छोड़ नए उत्साह के साथ उड़ रहे थे और सड़क पर चहल-पहल भी धीरे धीरे बढ रही थी। दोपहर को जो शहर धूल मिटटी की गर्द में सना अपने दुर्भाग्य पर करुनादायी रुदन करता है, वह मानो एक निश्चल बालक के समान अपने ही खेल में मुग्ध फ़रवरी के हलके जाडो और धूप का आनंद ले रहा था। पप्पू भी इन सबसे अछुता न रहा। उसके रात भर की थकान छू-मंतर हो गई और वह नए उत्साह के साथ अपने गंतत्व की ओर बड़ने लगा।
रह रह कर उसके मन में निकट भविष्य में घटने वाली घटनाओ को लेकर रोमांच जाग रहा था। आज उसे एक कठिन कार्य जो करना था। जैसे ही उसकी नजर सड़क के किनारे बैठे फूल-वाले पर पड़ी, उसने सुर्ख लाल रंग का गुलाब खरीदने निश्चय किया। गुलाब खरीदते हुए अनायास ही उसका ध्यान भट्ट और शर्मा की और चला गया। कितने अच्छे दोस्त थे वो दोनों पप्पू के, परन्तु सब पीछे छुट गया। पप्पू को अचानक अपने बचपने पर हसी आ गई। यह उसकी ही तो मन-गनत कहानिया थी जो उनके बीच दरार बन गयी थी। उन्होंने कब पप्पू को अपने से अलग किया था? इसी नयी सुबह की स्फूर्ति कहा जाए या वैलेंटाइन दिवस का जादू, रह रह कर पप्पू का ह्रदय अपने पुराने मित्रो से मिलकर पुराने गिले-शिकवे दूर करने को करने लगा। उसके कदम वापिस मुड़ने को ही थे की उसका सेल-फ़ोन बजने लगा। यह उसके द्वारा लगाया गया अलार्म था। यकायक वह यथार्थ के धरातल पर लौट आया, अब सब कुछ पीछे छुट चूका था। उसका बचपना अब उसका दंभ बन चूका था। पुनः अपने द्वारा झेले हुए विषाद को याद करके उसके कदम उसके गंतत्व के लिए चल पड़े। सुबह की धूप अब चुभने लगी थी।
जिस प्रकार बिना इलाज के एक छोटा सा फोड़ा भी नासूर बन जाता है, उसी प्रकार पप्पू का संकोच उसके अवसाद का कारण बना। एकांत में समय गुजारते गुजारते न जाने कौन कौन से प्रश्न उसे झंझोरते रहे। कभी अपने संकोच पर तरस आया तो कभी जीवन के उद्देश्य पर सवालिया निशाँ उभर आए। अध्ययन से धीरे धीरे ध्यान जाता रहा और वह पाता नही किस अनबुझी पहेली को सुलझाने के लिए नए नए मार्ग ढूढने लगा। यह चंचल मन भी कभी एक पथ पर एकचित नहीं हो पाता। यही तनाव उसे न जाने किन किन गलियों में ले गया। कभी उसने नशे में जिंदगी तलाशी तो कभी लाल-बत्ती और घांस-मंदी की आवारा गलियों में। काली अँधेरी रात उसकी दोस्त हो चली और दिन के उजाला मानो जन्मो का दुश्मन हो गया। अपनी ही उधेड़-बुन में व्यस्त एक एक करके सभी व्यसन उसने अपनाए और उतनी ही शीघ्रता से छोड़ भी दिए। कभी आत्म-ग्लानि बीच में आ गयी तो कभी पुराने आदर्शो ने उसके भटकते हुए कदमो पर लगाम लगा दी। अकेलापन फिर भी उसके साथ रहा। उसके हॉस्टल के साथियो ने भी एक एक करके उसपर ध्यान देना छोड़ दिया, और पप्पू अपने लिए नए नए रास्ते खोजने में लगा रहा। लगभग दो महीने पहले उसकी मुलाकात रघुनाथ जी से हुई और तब से उसके अशांत मन को एक सहारा मिला।
पप्पू रघुनाथ जी से अपनी पहली मुलाकात के बारे में सोचता हुआ, फूल-बाग़ पहुँच गया था। वहां और भी कई नव-युवक खड़े थे। कोई रंगीन वस्त्रो में था तो कोई कड़ी के कुरते में. छोटे छोटे समूह में चर्चाओ का दौर चालू था। रोमांच और उत्साह की लहर से बाग़ लबालब हो रहा था। जिस देश के नव-युवक इस उत्साह के स्वामी होते है, उस देश की तरक्की में किसी को भला क्या संदेह।
पप्पू ने भी एक दो नव-युवको से बातचीत की और तभी रघुनाथ जी वही बने हुए छोटे से मंच पर माइक ठीक करके कुछ बोलने लगे।
"मेरे राष्ट्र की अनमोल धरोहर, मेरे राम-राज्य की पराक्रमी सेना! आज समय आ गया है जब पश्चिम-वाद की चरण-वंदना करने वाला यह समाज हमारे राम-राज्य की वास्तविक शक्तियों से अवगत होगा। संसार में शालीनता की प्रतिमा माने जाने वाले हमारे विराट देश की प्रतिष्ठा पर प्रहार करने वाले और दिखावे की दोगली रास लीला रचाने वाले युवको को आज हमारी श्री-राम सेना वह सबक सिखायेगी की उनके ह्रदय में नारी के प्रति सम्मान और हमारे धरम के प्रति निष्ठा फिर से जाग्रत होगी।"
रघुनाथ जी के स्वर एक नए जोश का संचार कर रहे थे। सब तलिन्नता से उनकी विचार-गंगा का आनंद ले रहा था, और एक बार फिर पप्पू का ध्यान कहीं खो गया। उसे कुछ अजीब लग रहा था। मन में शंका उठ रही थी अपने इस कदम के विपरीत। सब प्रकार के व्यसनों से भी जब उसे शांति नहीं मिली थी तो धर्म के इस मार्ग ने ही तो जीवन में एक उद्देश्य दिया था। उसके साथ श्री-राम सेना में जुड़ने वाले युवक अपने अलग अलग स्वार्थ को साधे बैठे थे। किसी की लिए यह सिर्फ एक मनोरंजन का साधन था तो किसी के लिए जीवन का एक मात्र लक्ष्य। कोई समाज से बेइज्जत होकर इस सेना का हिस्सा बना था तो कोई कुछ काम न होने की त्रासदी में। किसी के ह्रदय में समाज में भेद-भाव को लेकर आक्रोश था तो किसी के ह्रदय में कुछ कर गुजरने का जज्बा। मनोभाव कुछ भी हो सेवा तो राम की है, ऐसा रघुनाथ जी कहते थे। परन्तु आज उसे यह सब मिथ्या लग रहा था, एक छलावा जो वह स्वंय के साथ कर रहा था। आत्मा एक बोझ में दबी जा रही थे, दम घुटने को था।
तभी 'जय श्री-राम' का स्वर गूंजा और पप्पू पुनः यथार्थ के धरातल पर आ खडा हुआ। देखते ही देखते सभी युवको ने अपने अपने गुलाब के पुष्प को निर्दयीता से कुचल दिया। रघुनाथ जी के साथी सबको हॉकी, चैन इत्यादि वितरित कर रहे थे। कुछ दिनों पूर्व की गयी घोषणा के अनुसार आज का कार्यक्रम निर्धारित हो चूका था। छोटे छोटे समूह में युवको को पश्चिमवाद पर प्रहार करने का आदेश मिल चूका था। रास्ते में आने वाले किसी भी प्रेमी युगल को अच्छा सबक कैसे सिखाया जाये, यह किसी को बताने की आवश्यकता नहीं थी। सभी को पता था की क्या करना हैं। सबका जीवन एक उद्देश्य की प्राप्ति में लगा हुआ था। इसी उद्देश्य का ध्यान आते ही उसने भी आगे बड़कर एक हॉकी अपने हाथ में ले ली, और थियेटर की और जाते हुए समूह का हिस्सा बन गया। आखिर भट्ट और शर्मा वही तो होंगे। जय श्री-राम के सिंह-नाद के साथ नव-युवको की टोलिया अलग अलग दिशा में जाने लगी। दोपहर होने को थी। पक्षियों का स्वर गाडियों के शोर में डूब रहा था। सुबह की सुहानी धूप और पवन के झोंके कहीं खो गए थे। कुछ क्षण पूर्व अठखेली करता शहर अपने दुर्भाग्य पर अंतर्नाद कर रहा था, और पप्पू 'जय श्री-राम' का नारा लगता हुआ अपने समूह का प्रतिनिधित्व कर रहा था। आज पप्पू को अपने अवसाद से मुक्ति पाने का मौका जो मिला था।
भोर होने की आस में रोशनदान पर नजर गडाए पप्पू पुनः विचारो के भंवर-जाल में खो गया। इसी दिन का तो वह पिछले एक सप्ताह से प्रतीक्षा कर रहा था। यदि यह कहा जाए की इस दिन का इन्तजार उसे कई महीनो से था तो भी अतिशयोक्ति न होगी। कॉलेज में प्रथम वर्ष तो सेनिअर्स की सेवा और रैगिंग में ही निकल गया। कब परीक्षाये आई और कब चली गया, पता ही नही चला। प्रारम्भ में अनजाना लगने वाला यह हॉस्टल और नया शहर मानो उसके जीवन के अभिन्न अंग हो गए। सकुचाते हुए अनजान लोगो से बातचीत का सिलसिला एक बार आरम्भ हुआ तो पूरे हॉस्टल की दोस्ती के बाद ही रुका। बंगाल वाला भट्ट हो या दिल्ली का शर्मा, अब तो सब उसके मौज मस्ती के साथी बन चुके थे। सबने मिलजुल कर अध्ययन भी किया तो मस्ती भी खूब मारी, परन्तु लड़कियों के मामले में बेचारा पप्पू पिछड़ गया। भला लखीमपुर जैसे छोटे से गाँव में कहाँ उसे 'को-एड' का सोभाग्य मिलाता? जहाँ उसके कॉलेज के मित्रगन अपने स्कूल के समय से ही 'अस-ऍम-अस' की दिव्य शक्तियों से अवगत थे, वहाँ बिचारे पप्पू को तो इन सब हथकंडो की भनक भी नही थी। इसका यह अभिप्राय नही हैं की कभी पप्पू ने किसी लड़की की तरफ आँख भी उठाकर नही देखा, बस कभी बात-चित का मौका नही मिला।
कॉलेज में अध्ययन के दौरान उसने बहुत कुछ सिखा, फिर भी अपने रसिक मित्रो की बराबरी कहाँ कर पाता। हॉस्टल की मस्ती के साथ साथ उसके मित्रगन कॉलेज के बगल के पुष्प-उद्यान में भी समय बिताते थे, शहर के बाहर के थिएटर में अपनी गर्ल-फ्रिएंड्स के साथ सिनेमा देखते थे, और बेचारा पप्पू मन ही मन कुडता रहता था। एक अदद लव स्टोरी बनाने के उसने भी भरसक प्रयास किए। कभी डांस सीखने के बहाने से तो कभी नोट्स लेने के बहाने से, जब भी उसने किसी सुंदरी से संपर्क करना चाहा, तो मानो जुबान को सांप डस गया। शब्द रुक गए, धड़कन बढ गई और पसीना छुटने लगा।
पप्पू के दोस्तों ने भी कई यतन किए। उसे सिनेमा दिखाया, किसी भी लड़की से बात करने के लिए वार्तालाप लिख के दिए, हॉस्टल में प्रयोग करवाए, परन्तु हाय रे फूटी किस्मत, पप्पू का संकोच जस का तस् रहा। थक हार कर सबने उसे उसके हाल पर छोड़ दिया और अपने अपने जीवन में व्यस्त हो गए। एक बार फिर से यह शहर उसके लिए पराया हो गया।
अचानक पप्पू के भावनाओ का प्रवाह बाहर से आने वाले शोर से टूटा। लगता है जैसे पूरा हॉस्टल करवटो में रात काट रहा हैं और भोर की पहली किरण की राह देख रहा हैं। हॉस्टल के बाकी लोगो का ख़याल आते है उसने तुंरत उठने का निश्चय किया। उसके पुराने मित्र अब उसके मित्र कहाँ रहे थे, सभी अपने अपने जीवन में अपनी अपनी गर्ल-फ्रिएंड्स के साथ व्यस्त थे। इससे पहले की उसे फिर से न चाहते हुए भी शर्मा और भट्ट से नजर मिलनी पड़े, उसने मुहं अंधेरे ही हॉस्टल से निकल जाना उचित समझा।
इस तरह सबसे नज़रे छिपाए हॉस्टल से निकल जाना भी अब तो नया नही था। पप्पू के गहरे दोस्त भट्ट और शर्मा की प्रेम कहानिया दिन दुगनी रात चोगनी तरक्की कर रही थी। वो दोनों ही अब अपना समय अपनी-अपनी प्रेमिकाओ के साथ ज्यादा बिताते थे। जब भी उन्होंने पप्पू को साथ में ले जाकर अपनी प्रेमिकाओ से मिलवाना चाहा, पप्पू का लड़कियों के प्रति भय राह का रोड़ा बन गया। धीरे धीरे पप्पू के सबसे अच्छे दोस्त ही उसका मजाक उडाने लगे। 'Pappu can't dance saala' गाने ने तो जैसे आग में घी का काम किया। जिसे देखो वह पप्पू को देख कर यही गाना गाता, और बेचारा पप्पू चाह कर भी कुछ नही कर पाता। कभी अपने आप को अपने कमरे में बंद किया तो कभी लाइब्रेरी में, परन्तु इस तनाव ने कभी उसका साथ नही छोडा।
इसी उधेड़-बुन में वह बहुत दूर आ गया था। हॉस्टल भी पीछे छूट गया और भयावह अंधकार भी। सुहानी पवन से अठखेलिया करती सूर्य की प्रथम किरणे अलोकिक ऊर्जा का संचार कर रही थी। रात्रि के घोर अंधेरे से निकल कर मानो सभी पेड़-पौधे और जीव-जन्तु अटल श्रद्धा के साथ सात अश्वो के रथ पर व्योम की सेर करने वाले सूर्य देव की स्तुति कर रहे थे। पक्षी अपने घोंसलों को छोड़ नए उत्साह के साथ उड़ रहे थे और सड़क पर चहल-पहल भी धीरे धीरे बढ रही थी। दोपहर को जो शहर धूल मिटटी की गर्द में सना अपने दुर्भाग्य पर करुनादायी रुदन करता है, वह मानो एक निश्चल बालक के समान अपने ही खेल में मुग्ध फ़रवरी के हलके जाडो और धूप का आनंद ले रहा था। पप्पू भी इन सबसे अछुता न रहा। उसके रात भर की थकान छू-मंतर हो गई और वह नए उत्साह के साथ अपने गंतत्व की ओर बड़ने लगा।
रह रह कर उसके मन में निकट भविष्य में घटने वाली घटनाओ को लेकर रोमांच जाग रहा था। आज उसे एक कठिन कार्य जो करना था। जैसे ही उसकी नजर सड़क के किनारे बैठे फूल-वाले पर पड़ी, उसने सुर्ख लाल रंग का गुलाब खरीदने निश्चय किया। गुलाब खरीदते हुए अनायास ही उसका ध्यान भट्ट और शर्मा की और चला गया। कितने अच्छे दोस्त थे वो दोनों पप्पू के, परन्तु सब पीछे छुट गया। पप्पू को अचानक अपने बचपने पर हसी आ गई। यह उसकी ही तो मन-गनत कहानिया थी जो उनके बीच दरार बन गयी थी। उन्होंने कब पप्पू को अपने से अलग किया था? इसी नयी सुबह की स्फूर्ति कहा जाए या वैलेंटाइन दिवस का जादू, रह रह कर पप्पू का ह्रदय अपने पुराने मित्रो से मिलकर पुराने गिले-शिकवे दूर करने को करने लगा। उसके कदम वापिस मुड़ने को ही थे की उसका सेल-फ़ोन बजने लगा। यह उसके द्वारा लगाया गया अलार्म था। यकायक वह यथार्थ के धरातल पर लौट आया, अब सब कुछ पीछे छुट चूका था। उसका बचपना अब उसका दंभ बन चूका था। पुनः अपने द्वारा झेले हुए विषाद को याद करके उसके कदम उसके गंतत्व के लिए चल पड़े। सुबह की धूप अब चुभने लगी थी।
जिस प्रकार बिना इलाज के एक छोटा सा फोड़ा भी नासूर बन जाता है, उसी प्रकार पप्पू का संकोच उसके अवसाद का कारण बना। एकांत में समय गुजारते गुजारते न जाने कौन कौन से प्रश्न उसे झंझोरते रहे। कभी अपने संकोच पर तरस आया तो कभी जीवन के उद्देश्य पर सवालिया निशाँ उभर आए। अध्ययन से धीरे धीरे ध्यान जाता रहा और वह पाता नही किस अनबुझी पहेली को सुलझाने के लिए नए नए मार्ग ढूढने लगा। यह चंचल मन भी कभी एक पथ पर एकचित नहीं हो पाता। यही तनाव उसे न जाने किन किन गलियों में ले गया। कभी उसने नशे में जिंदगी तलाशी तो कभी लाल-बत्ती और घांस-मंदी की आवारा गलियों में। काली अँधेरी रात उसकी दोस्त हो चली और दिन के उजाला मानो जन्मो का दुश्मन हो गया। अपनी ही उधेड़-बुन में व्यस्त एक एक करके सभी व्यसन उसने अपनाए और उतनी ही शीघ्रता से छोड़ भी दिए। कभी आत्म-ग्लानि बीच में आ गयी तो कभी पुराने आदर्शो ने उसके भटकते हुए कदमो पर लगाम लगा दी। अकेलापन फिर भी उसके साथ रहा। उसके हॉस्टल के साथियो ने भी एक एक करके उसपर ध्यान देना छोड़ दिया, और पप्पू अपने लिए नए नए रास्ते खोजने में लगा रहा। लगभग दो महीने पहले उसकी मुलाकात रघुनाथ जी से हुई और तब से उसके अशांत मन को एक सहारा मिला।
पप्पू रघुनाथ जी से अपनी पहली मुलाकात के बारे में सोचता हुआ, फूल-बाग़ पहुँच गया था। वहां और भी कई नव-युवक खड़े थे। कोई रंगीन वस्त्रो में था तो कोई कड़ी के कुरते में. छोटे छोटे समूह में चर्चाओ का दौर चालू था। रोमांच और उत्साह की लहर से बाग़ लबालब हो रहा था। जिस देश के नव-युवक इस उत्साह के स्वामी होते है, उस देश की तरक्की में किसी को भला क्या संदेह।
पप्पू ने भी एक दो नव-युवको से बातचीत की और तभी रघुनाथ जी वही बने हुए छोटे से मंच पर माइक ठीक करके कुछ बोलने लगे।
"मेरे राष्ट्र की अनमोल धरोहर, मेरे राम-राज्य की पराक्रमी सेना! आज समय आ गया है जब पश्चिम-वाद की चरण-वंदना करने वाला यह समाज हमारे राम-राज्य की वास्तविक शक्तियों से अवगत होगा। संसार में शालीनता की प्रतिमा माने जाने वाले हमारे विराट देश की प्रतिष्ठा पर प्रहार करने वाले और दिखावे की दोगली रास लीला रचाने वाले युवको को आज हमारी श्री-राम सेना वह सबक सिखायेगी की उनके ह्रदय में नारी के प्रति सम्मान और हमारे धरम के प्रति निष्ठा फिर से जाग्रत होगी।"
रघुनाथ जी के स्वर एक नए जोश का संचार कर रहे थे। सब तलिन्नता से उनकी विचार-गंगा का आनंद ले रहा था, और एक बार फिर पप्पू का ध्यान कहीं खो गया। उसे कुछ अजीब लग रहा था। मन में शंका उठ रही थी अपने इस कदम के विपरीत। सब प्रकार के व्यसनों से भी जब उसे शांति नहीं मिली थी तो धर्म के इस मार्ग ने ही तो जीवन में एक उद्देश्य दिया था। उसके साथ श्री-राम सेना में जुड़ने वाले युवक अपने अलग अलग स्वार्थ को साधे बैठे थे। किसी की लिए यह सिर्फ एक मनोरंजन का साधन था तो किसी के लिए जीवन का एक मात्र लक्ष्य। कोई समाज से बेइज्जत होकर इस सेना का हिस्सा बना था तो कोई कुछ काम न होने की त्रासदी में। किसी के ह्रदय में समाज में भेद-भाव को लेकर आक्रोश था तो किसी के ह्रदय में कुछ कर गुजरने का जज्बा। मनोभाव कुछ भी हो सेवा तो राम की है, ऐसा रघुनाथ जी कहते थे। परन्तु आज उसे यह सब मिथ्या लग रहा था, एक छलावा जो वह स्वंय के साथ कर रहा था। आत्मा एक बोझ में दबी जा रही थे, दम घुटने को था।
तभी 'जय श्री-राम' का स्वर गूंजा और पप्पू पुनः यथार्थ के धरातल पर आ खडा हुआ। देखते ही देखते सभी युवको ने अपने अपने गुलाब के पुष्प को निर्दयीता से कुचल दिया। रघुनाथ जी के साथी सबको हॉकी, चैन इत्यादि वितरित कर रहे थे। कुछ दिनों पूर्व की गयी घोषणा के अनुसार आज का कार्यक्रम निर्धारित हो चूका था। छोटे छोटे समूह में युवको को पश्चिमवाद पर प्रहार करने का आदेश मिल चूका था। रास्ते में आने वाले किसी भी प्रेमी युगल को अच्छा सबक कैसे सिखाया जाये, यह किसी को बताने की आवश्यकता नहीं थी। सभी को पता था की क्या करना हैं। सबका जीवन एक उद्देश्य की प्राप्ति में लगा हुआ था। इसी उद्देश्य का ध्यान आते ही उसने भी आगे बड़कर एक हॉकी अपने हाथ में ले ली, और थियेटर की और जाते हुए समूह का हिस्सा बन गया। आखिर भट्ट और शर्मा वही तो होंगे। जय श्री-राम के सिंह-नाद के साथ नव-युवको की टोलिया अलग अलग दिशा में जाने लगी। दोपहर होने को थी। पक्षियों का स्वर गाडियों के शोर में डूब रहा था। सुबह की सुहानी धूप और पवन के झोंके कहीं खो गए थे। कुछ क्षण पूर्व अठखेली करता शहर अपने दुर्भाग्य पर अंतर्नाद कर रहा था, और पप्पू 'जय श्री-राम' का नारा लगता हुआ अपने समूह का प्रतिनिधित्व कर रहा था। आज पप्पू को अपने अवसाद से मुक्ति पाने का मौका जो मिला था।
Tuesday, January 13, 2009
कहीं आप...
यह समय है सवाल पूछने का, जिसे देखिये आपके लिए एक सवाल लेकर हाजिर हैं। कहीं चुनाव का सवाल है तो कहीं भ्रष्टाचार का, कहीं कम कपडो का सवाल है तो कहीं दो वक्त के अनाज का। और अगर आप इन सब बातों से ऊपर उठकर सिर्फ़ अपने में ही मगन है तो सवाल है प्रमोशन का, नौकरी का, छोकरी का, कमाई का और तो और खर्चे का, तो ऐसे में भला आप क्यूँ मेरे इस नए सवाल को तवज्जो देने लगे? तो जनाब मेरी बात ध्यान से सुनिए और सोचिए क्यूंकि यह सवाल जाने-अनजाने आप अपने आप से कई बार पूछ चुके है और झुठला चुके है इसके अस्तित्व को, परन्तु यह एक यक्ष प्रशन है जिसका जवाब में भी खोज रहा हूँ। तो आइये मिलकर यह गुत्थी सुलझाते हैं।
हाँ तो सवाल यह है की कहीं आप बुडे तो नही हुए जा रहे। समय का चक्र तो निरंतर चल रहा है, दिन पर दिन और वर्ष पर वर्ष बीते जा रहे है, परन्तु कहीं ना कहीं आप नीरसता तो नही महसूस कर रहे। आइये जरा इस व्याधि के अन्य लक्षणों पर एक नजर डाल ले।
* कुछ करने का मन नही करता है।
* बार बार पुरानी एल्बम लेकर बैठ जाते है और निहारते है अपने बीते हुए दिनों को।
* परम-सुख देने वाला इन्टरनेट बोरिंग लगने लगता है।
* सभी जोक्स सुने-सुनाये लगते है।
* रह रह कर यही सवाल मन में दौड़ता है, 'अब क्या?', 'अब क्यूँ?'।
* स्वप्न देखने की शक्ति क्षीण हो चुकी है।
* आलस्य में अब वो सुख नही मिलाता।
* कहीं आने-जाने का मन नही करता।
*लोगो से मिलाना गवांरा नही होता।
यदि आप उपरोक्त लक्षणों में से किसी से भी ग्रस्त है तो संभल जाइये, यह आपके बुडापे का संकेत है। कॉलेज के दिनों में फन्ने-खां बनकर जिंदगी को सिगरेट के धुंवे में उडाने वाले मस्त-मौजी प्राणी को समय की काली-नजर लगती जा रही है। कभी भविष्य अन्धकार-मय दिखता है तो कभी इतिहास सुहाना लगने लगता है, और हम भूल जाते है हमारे आज को। ज्यादा भावुक होने अथवा परेशान होने की आवश्यकता कतई नही है, क्यूंकि प्रत्येक समस्या का हल सम्भव है। यह रहे आपके खोये हुए उत्साह को पाने के लाजवाब नुस्खे:
* सबसे पहले तो इन्टरनेट की दैविक शक्तियों का पुनः पूजन करने लगिए। यही वो इन्टरनेट है जिसके द्वारा आपने घंटो अपने रूमानी हर्दय को सुख दिया है। बात चेटिंग की हो या ऑरकुट पर समय नष्ट करने की, यह इन्टरनेट ही आपको आपके असली दर्शन करवा सकता है। तो सोचना क्या है, एक बकवास सा ईमेल लिखिए जिसमे कोई बचकाना हरकत हो, और भेज दीजिये अपने मित्रो को। परवाह ना करिए उनके रेस्पोंस की, कहीं न कहीं वो भी इस नीरस जिंदगी से उब रहे है।
* यह समय है गोविंदा और मिथुन की फिल्म्स देखने का। जल्द से जल्द अपने डेविड-धवन कलेक्शन में से एक बे-सर-पैर की फ़िल्म देख डालिए। जीवन के अर्थ को समझाती, गरीबो को करोड़पति बनाती और भरी-भरकम शरीर वाले हीरो की फ़िल्म देखने वाले भी भला इस विकत प्रश्न से बच पाए है, जो आप एक असफल प्रयास करना चाहेंगे। यह वक़्त है, कादर-खान के दो-मतलब वाले भाषण सुनकर मुस्कुराने का, अनु-मलिक के सेक्सी गाने गुन-गुनने का और गोविंदा के ठुमके लगाने का।
* अपने भविष्य का तो बहुत विचार कर लिया आपने, पुराने समय को निहार भी खूब लिया, अब कुछ आज में करिए। पुराने दोस्त लोग साथ नही तो कोई मलाल नही नए बन जायेंगे, वैसे भी पुराने लंगूर किस काम के थे? और यदि नए दोस्त और भी बड़े आइटम है तो भाड़ में जाने दीजिये उनको, और पूछिये अपने आप से की आपको क्या चाहिए।
* और अंत में सबसे कारगर नुस्खा, एक कागज लीजिये और इन प्रश्नों के उत्तर लिखिए:
मेरी उम्र:
मेरी ख्वाइशे:
मैंने जो आज तक कभी नही किया:
मैं जहाँ आज तक नही गया:
बस फिर क्या है, हो गए आप फिर से जवान। यह बुडापा तो एक मिथ्या है मेरे दोस्त, समय तो चलता रहेगा, परन्तु हमे बदल सके समय में इतना जोर कहाँ?
हाँ तो सवाल यह है की कहीं आप बुडे तो नही हुए जा रहे। समय का चक्र तो निरंतर चल रहा है, दिन पर दिन और वर्ष पर वर्ष बीते जा रहे है, परन्तु कहीं ना कहीं आप नीरसता तो नही महसूस कर रहे। आइये जरा इस व्याधि के अन्य लक्षणों पर एक नजर डाल ले।
* कुछ करने का मन नही करता है।
* बार बार पुरानी एल्बम लेकर बैठ जाते है और निहारते है अपने बीते हुए दिनों को।
* परम-सुख देने वाला इन्टरनेट बोरिंग लगने लगता है।
* सभी जोक्स सुने-सुनाये लगते है।
* रह रह कर यही सवाल मन में दौड़ता है, 'अब क्या?', 'अब क्यूँ?'।
* स्वप्न देखने की शक्ति क्षीण हो चुकी है।
* आलस्य में अब वो सुख नही मिलाता।
* कहीं आने-जाने का मन नही करता।
*लोगो से मिलाना गवांरा नही होता।
यदि आप उपरोक्त लक्षणों में से किसी से भी ग्रस्त है तो संभल जाइये, यह आपके बुडापे का संकेत है। कॉलेज के दिनों में फन्ने-खां बनकर जिंदगी को सिगरेट के धुंवे में उडाने वाले मस्त-मौजी प्राणी को समय की काली-नजर लगती जा रही है। कभी भविष्य अन्धकार-मय दिखता है तो कभी इतिहास सुहाना लगने लगता है, और हम भूल जाते है हमारे आज को। ज्यादा भावुक होने अथवा परेशान होने की आवश्यकता कतई नही है, क्यूंकि प्रत्येक समस्या का हल सम्भव है। यह रहे आपके खोये हुए उत्साह को पाने के लाजवाब नुस्खे:
* सबसे पहले तो इन्टरनेट की दैविक शक्तियों का पुनः पूजन करने लगिए। यही वो इन्टरनेट है जिसके द्वारा आपने घंटो अपने रूमानी हर्दय को सुख दिया है। बात चेटिंग की हो या ऑरकुट पर समय नष्ट करने की, यह इन्टरनेट ही आपको आपके असली दर्शन करवा सकता है। तो सोचना क्या है, एक बकवास सा ईमेल लिखिए जिसमे कोई बचकाना हरकत हो, और भेज दीजिये अपने मित्रो को। परवाह ना करिए उनके रेस्पोंस की, कहीं न कहीं वो भी इस नीरस जिंदगी से उब रहे है।
* यह समय है गोविंदा और मिथुन की फिल्म्स देखने का। जल्द से जल्द अपने डेविड-धवन कलेक्शन में से एक बे-सर-पैर की फ़िल्म देख डालिए। जीवन के अर्थ को समझाती, गरीबो को करोड़पति बनाती और भरी-भरकम शरीर वाले हीरो की फ़िल्म देखने वाले भी भला इस विकत प्रश्न से बच पाए है, जो आप एक असफल प्रयास करना चाहेंगे। यह वक़्त है, कादर-खान के दो-मतलब वाले भाषण सुनकर मुस्कुराने का, अनु-मलिक के सेक्सी गाने गुन-गुनने का और गोविंदा के ठुमके लगाने का।
* अपने भविष्य का तो बहुत विचार कर लिया आपने, पुराने समय को निहार भी खूब लिया, अब कुछ आज में करिए। पुराने दोस्त लोग साथ नही तो कोई मलाल नही नए बन जायेंगे, वैसे भी पुराने लंगूर किस काम के थे? और यदि नए दोस्त और भी बड़े आइटम है तो भाड़ में जाने दीजिये उनको, और पूछिये अपने आप से की आपको क्या चाहिए।
* और अंत में सबसे कारगर नुस्खा, एक कागज लीजिये और इन प्रश्नों के उत्तर लिखिए:
मेरी उम्र:
मेरी ख्वाइशे:
मैंने जो आज तक कभी नही किया:
मैं जहाँ आज तक नही गया:
बस फिर क्या है, हो गए आप फिर से जवान। यह बुडापा तो एक मिथ्या है मेरे दोस्त, समय तो चलता रहेगा, परन्तु हमे बदल सके समय में इतना जोर कहाँ?
Tuesday, January 6, 2009
सुबह हो गई मामू!
यूँ तो रोज एक नया दिन आता है, नई उमंग और नए वादों के साथ, परन्तु नव-वर्ष की बेला की बात ही निराली है। एक साधारण दिन को हम असाधारण तरीके से मनाते है, पलकें बिछाये इसका इन्तजार करते है और इसके गुजर जाने पर कुछ ही क्षण में भूल भी जाते है। ऐसा ही कुछ होता है हमारे न्यू इयर रेसोलुशन्स के साथ। लिस्ट बनाओ, सोचो, विचार करो, और ले लो ढेर सारे रेसोलुशन्स, मानो परमदयालु ईश्वर ने हमे एक और मौका दे दिया हो, एक अलग जिंदगी जीने का, एक अलग तरह के व्यक्तित्व के स्वामी बनने का। हम भी बच्चो के समान न जाने क्या क्या सपने संजोये ख्वाबो की दुनिया में हिल्लोरे लेने लगते है, नव-वर्ष की बेला आते आते। सुबह जल्दी उठेंगे, नियमित व्यायाम करेंगे, एक हफ्ते में तीन से ज्यादा फिल्म्स नही देखेंगे, और भी न जाने कैसे कैसे रेसोलुशन्स ले लेते है।
बात सिर्फ़ रेसोलुशन्स लेने तक ही सिमित रहती तो कितना अच्छा था, परन्तु हम उस से और भी दो कदम आगे जाकर उनके पूरा होने के बाद के कार्यक्रम की भी कल्पना कर लेते है। चूँकि हम सुबह जल्दी उठने लगेंगे तो, नास्ता करने की भी आदत पड़ जायेगी। नियमित व्यायाम के लिए जिम की मेम्बरशिप भी तो चाहिए होगी। यदि फिल्म्स नही देखेंगे तो समय व्यतीत करने के लिए मेग्जींस चाहिए होंगी, इत्यादी इत्यादी इत्यादी।
अरे मेरे मूरख मन! तू जो इतना संयमशील होता तो यह सब ख्वाब पिछले ही बरस ना पूरे हो जाते। उठ जाग और धारण कर अपने नियमित व्यव्हार को। सुबह जल्दी उठना एक मिथ्या है, देर रात तक इन्टरनेट पर वक्त गुजारना ही सत्य है। नियमित व्यायाम करना तेरी रगो में कहाँ, तू तो आलस की प्रतिमा है, मान ले इस सत्य को और लग जा परमसुखदेय आलस्य के पूजन में। यह नव-वर्ष तो प्रतिवर्ष आएगा, और अगर तू इस बार ही सारे रेसोलुशन पूरण कर लेगा तो अगले वर्ष क्या करेगा? कम से कम भविष्य की तो सोच। सपनो की दुनिया से निकल हे मूड-मति! और जाग। देख सुबह हो गयी है, नव-वर्ष बेला जा चुकी है।
मेरा मन तो बार बार यही कह रहा है और आपका?
बात सिर्फ़ रेसोलुशन्स लेने तक ही सिमित रहती तो कितना अच्छा था, परन्तु हम उस से और भी दो कदम आगे जाकर उनके पूरा होने के बाद के कार्यक्रम की भी कल्पना कर लेते है। चूँकि हम सुबह जल्दी उठने लगेंगे तो, नास्ता करने की भी आदत पड़ जायेगी। नियमित व्यायाम के लिए जिम की मेम्बरशिप भी तो चाहिए होगी। यदि फिल्म्स नही देखेंगे तो समय व्यतीत करने के लिए मेग्जींस चाहिए होंगी, इत्यादी इत्यादी इत्यादी।
अरे मेरे मूरख मन! तू जो इतना संयमशील होता तो यह सब ख्वाब पिछले ही बरस ना पूरे हो जाते। उठ जाग और धारण कर अपने नियमित व्यव्हार को। सुबह जल्दी उठना एक मिथ्या है, देर रात तक इन्टरनेट पर वक्त गुजारना ही सत्य है। नियमित व्यायाम करना तेरी रगो में कहाँ, तू तो आलस की प्रतिमा है, मान ले इस सत्य को और लग जा परमसुखदेय आलस्य के पूजन में। यह नव-वर्ष तो प्रतिवर्ष आएगा, और अगर तू इस बार ही सारे रेसोलुशन पूरण कर लेगा तो अगले वर्ष क्या करेगा? कम से कम भविष्य की तो सोच। सपनो की दुनिया से निकल हे मूड-मति! और जाग। देख सुबह हो गयी है, नव-वर्ष बेला जा चुकी है।
मेरा मन तो बार बार यही कह रहा है और आपका?
Subscribe to:
Comments (Atom)