Wednesday, April 22, 2009

मिश्रा जी M. B. A. (भाग- २)

मिश्रा-जी के स्वागत की तैयारियां हो चुकी थी। सावधानी के तौर पर कुछ नए कानून लागू किए गए थे, मसलन किसी भी तरह की यूनियन अथवा संगठन बनाने पर अनिश्चित काल के लिए रोक लगा दी गयी थी, मिश्रा-जी से दूरी बनाये रखने एवं स्वयं से वार्तालाप न शुरू करने के निर्देश दिए गए थे। मिश्रा-जी को इन सब नए कानून की ख़बर न लगने देने का भी प्रबंध कर दिया गया था। मिश्रा-जी उस बिन बुलाये अतिथि के समान थे, जिनकी खातिरदारी भी करनी पड़ती हैं और घर की शान्ति न भंग हो ऐसा प्रबंध भी करना पड़ता हैं। अंततः मिश्रा-जी भी आ पहुंचे।

मृत्यु के पश्चात भी उनके चेहरे का तेज कुछ कम नही हुआ था। सामान्यतया मृत प्राणी शोकग्रस्त लगते है, परन्तु मिश्रा-जी तो स्वाभाविक एवं आत्मविश्वास से भरे हुए लग रहे थे, मानो यह यात्रा उनके लिए एक internship के समान हो। यमराज ने उनके रहने के प्रबंध के बारे में बताते हुए कहा की, किन्ही अज्ञात कारणों से उन्हें यमलोक में ही कुछ समय गुजरना पड़ेगा। उनकी देखभाल के लिए शंखनाद और सिंघनाद को उनकी सेवा में नियुक्त कर दिया गया। मिश्रा-जी सब कुछ चाव से सुन रहे थे और रह-रह कर इधर-उधर के प्रशन भी पूछ रहे थे। मिश्रा-जी को आराम करने के लिए भेज कर यमराज ने चित्रगुप्त को बुला भेजा।

'यह प्राणी तो अत्यन्त सदाचारी प्रतीत होता हैं। मोह-माया से परे, सबका भला चाहने वाला एवं इतना मृदुभाषी प्राणी तो हमने विगत कई युगों में नही देखा। तुम्हे स्वयं उस से मिलकर अपना भ्रम दूर करना चाहिए चित्रगुप्त।', यमराज को मिश्रा-जी पर कोई शक नही था।

'सावधान महराज! ऍम बी ऐ नामक कुटिल माया के छल से सावधान। वाक्-पटुता तो इस विधा की प्रथम आवश्यकता हैं। मुझे पहले ही अंदेशा था की वह प्राणी सबसे पहले आपको अपने वश में करने का प्रयास करेगा। उसके सम्मोहन से स्वयं को बचाने के लिए ही मैंने उसके सामने आना उचित नही समझा।'

यमराज को चित्र-गुप्त की ही बात माननी पड़ी। चित्र-गुप्त के अनुसार, मिश्रा-जी सभी यमदूतो को बहका-कर कोहराम खड़ा कर सकते हैं। यदि सभी यमदूत अपना कार्य छोड़ कर हड़ताल पर बैठ जाए, तो यमलोक में तो हाहाकार मच जाएगा। इसीलिए नए नए कानून बनाये गए थे।

कुछ ही दिनों में मिश्रा-जी तो जैसे यमराज के गहरे मित्र हो गए। मिश्रा-जी प्रतिदिन सिंघनाद और शंखनाद के साथ यमलोक के विभिन्न विभागों के भ्रमण के लिए जाते, और वापिस आकर यमराज से इन सब विभागों की कार्य-प्रणाली की प्रंशसा करते। लेखा-जोखा विभाग, यमदूत नियंत्रण विभाग, स्वर्ग-नरक विभाग इत्यादि सभी विभागों की कार्य प्रणाली का गहन विश्लेषण मिश्रा-जी ने कुछ ही दिनों में कर लिए था। यमराज से विचार-विमर्श के दौरान मिश्रा-जी कार्य-प्रणाली सम्बन्धि गहन प्रशन पूछते और यमराज प्रसन्नतापूर्वक उन प्रशनो का समाधान करते।

जहाँ एक और मिश्रा-जी की सदाचारिता में यमराज का विश्वास बढता जा रहा था, वही चित्रगुप्त की चिंता भी दिन रात बढती जा रही थी। उनके सभी अन्देशो को मिश्रा-जी एक एक करके झुठला चुके थे। ना तो उन्होंने कभी यमदूतो के संगठन का प्रयास किया, और ना ही किसी और प्रकार का उत्पात मचाने का प्रयास किया। जो भी उनसे मिलाता, उनकी सदाचारिता और बुद्धिमता के गुणगान करने लगता। उनके चहरे से किसी को भी किसी प्रकार की कुटिलता की भनक न लगी। यमराज के साथ मिश्रा-जी के दैनिक विचार-विमर्श के दौरान भी उन्होंने कभी किसी भी विभाग की कार्य-प्रणाली पर कोई शक नही किया। सभी में पूर्ण निष्ठां जताते हुए, प्रबंध की खुले दिल से प्रशंसा ही की।

एक दिन यमराज, मिश्रा-जी से गहन चर्चा में लगे थे तो अनायास ही उन्होंने मिश्रा-जी से पूछा की उन्हें कौनसा विभाग सबसे ज्यादा अच्छा लगता है?

मिश्रा-जी ने कुछ सोचकर उत्तर दिया, 'लेखा-जोखा विभाग', और वह उसकी कार्यप्रणाली की फिर से प्रशंसा करने लगे।

यमराज ने मन-ही-मन सोचा की, इसी विभाग के कारण, मिश्रा-जी को जीवन एवं मृत्यु के बीच यह समय गुजरना पड़ रहा है, और यह निर्दयी प्राणी इसी विभाग की प्रशंसा किए जा रहा हैं। अब तो यमराज को पूरा भरोसा हो गया था की, यह प्राणी एक सदाचारी है, एक निर्दयी प्राणी, जो भले मन से सबका हितेषी हैं। उसका बुरा करने वाले विभाग की भी यह इतनी प्रशंसा कर रहा हैं। तभी उन्हें मिश्रा-जी के ज्ञान का ध्यान आया। चित्रगुप्त के अनुसार ऍम बी ऐ तो अत्यन्त प्रभावशाली एवं कुटिल ज्ञान हैं, परन्तु यह प्राणी तो निरा निर्दोष प्रतीत होता हैं। 'तो क्यूँ न इस अनोखी विद्या का कुछ लाभ उठाया जाए', यह सोचते हुए यमराज ने मिश्रा-जी से प्रशन किया,

'मिश्रा-जी! क्या आप हमे एक कमी बता सकते है यमलोक की कार्य-प्रणाली की? कुछ सुझाव जो यहाँ की कार्यप्रणाली को और भी अधिक प्रभावशाली बना सके।'

मिश्रा-जी गहन सोच में डूब गए। यह तो उनके ज्ञान की परख थी। अत्यन्त सोच-विचार के बाद उन्होंने सुझाव दिया की, यमदूत को प्रथ्वी एक निर्धारित भाग न देकर, आवश्यकता के अनुसार कार्य सौंपा जाना चाहिए। कुछ ही दिनों पहले प्रथ्वी पर एक भयानक भूकंप आया था, और उस क्षेत्र विशेष की यमदूतो पर अत्यन्त कार्य-भार आ गया था, अन्य क्षेत्रो के यमदूतो की सेवाए उस समय ली जा सकती थी। मिश्रा-जी के लिए, यह एक सीधा-साधा Resource Management का प्रशन था। उन्हें यमदूत वितरण की प्रणाली को Pizza-Hut के delivery boys से model करने में ज्यादा समय नही लगा। उन्होंने यमराज को समझाते हुए बताया की, वर्तमान यमदूत वितरण प्रणाली समाचार-पत्र वितरण प्रणाली के समान ही अविचल है। यदि इसमे आवश्यकता के अनुसार परिवर्तन किए जाए, तो संसार से मृत प्राणियों को शीघ्र अति शीघ्र स्वर्ग अथवा नरक भिजवाया जा सकेगा।

यमराज को भी सीधी गणित समझाते देर न लगी, और उन्हें मिश्रा-जी की योग्यता पर भी अटल विश्वास हो चला। ऍम बी ऐ की क्षमताओ को उन्होंने अकारण ही विधवंसकारी मान लिया था, उन्हें तो इन सबका प्रयोग करना चाहिए। धीरे धीरे उन्हें लगने लगा की परम-पिता ने मिश्रा-जी को यमलोक के उत्थान के लिए ही भेजा हैं। बस फिर क्या था, चित्रगुप्त के लाख समझाने के बाद भी, मिश्रा-जी यमराज के प्रमुख सलाहकार बन गए।

मिश्रा-जी की सलाह देना का सिलसिला थमा नही। अभी कुछ ही दिनों पहले तक, यमलोक की कार्यप्रणाली की प्रशंसा करते नही थकने वाले मिश्रा-जी, अब नए नए सुझाव दे रहे थे। यमराज के कहने पर उन्होंने प्रत्येक विभाग का विश्लेषण करके विस्तार से अपने सुझाओ को रखना शुरू किया। यमदूतो के लिए shifts का प्रावधान लाया गया, प्रत्येक यमदूत के लिए एक अलग भेंसे का प्रबंध किया गया, एक मृत प्राणी को लाने के लिए एक से अधिक यमदूत के जाने पर रोक लगी इत्यादि इत्यादि। यह सभी सुझाव मिश्रा-जी ने वहाँ की कार्य प्रणाली को देखते हुए ही किए थे। उन्हें अब तक याद था की उन्हें लाने के लिए दो यमदूत आए थे, जबकि यह कार्य एक यमदूत ही कर सकता था।

मिश्रा-जी के सुझावों से किसी को कोई हानि नही उठानी पड़ी, वरन सभी कार्य समय से पूर्व ही होने लगे। अब तो धीरे धीरे चित्रगुप्त को भी विश्वास होने लगा था की मिश्रा-जी से यमलोक को कोई खतरा नही हैं। जब वह स्वयं मिश्रा-जी से मिले तो उन्हें भी कुटिलता की कोई झलक दिखायी नही दी। परन्तु रह रह कर उनके मन में अन्देशो का बवंडर आता रहता था। (अगले अंक में समाप्त....)

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