अपनी आखिरी साँसे लेते रोहन मिश्रा रह रह कर कमरे के दूसरी और दो भयावह आक्रतिया देख रहे थे। कभी उन्हें यह मात्र एक भ्रम लगा तो कभी अपने सर पर मंडराती मौत का साया। अपने जीवन में कभी उन्हें किसी प्रकार के भ्रम का सामना नही करना पड़ा। एकाग्र मन और मजबूत इच्छा-शक्ति के स्वामी, मिश्रा-जी ने जो चाहा वो पाया। सफल व्यापार और प्रभावशाली मित्रगन वाले मिश्रा-जी का यह दुर्भाग्य ही कहा जाएगा की पेंतीस वर्ष की अल्पायु में ही उन्हें एक जानलेवा दुर्घटना का सामना करना पड़ा। यह संसार मिश्रा-जी की बुद्धिमता से वंचित ही रह जाएगा, उनकी मृत्यु किसी भी क्षण निश्चित हैं।
जहाँ अपनी मृत्यु शय्या पर भी मिश्रा-जी अपनी इच्छा-शक्ति का परिचय दे रहे थे, वही दूसरी ओर उसी कमरे के दुसरे छोर पर खड़े दो यमदूत, शंखनाद और सिंघनाद, उनकी अन्तिम साँसों की बाट जोह रहे थे। सिंघनाद के लिए एक एक क्षण प्रतीक्षा करना भारी पड़ रहा था परन्तु शंखनाद तल्लीनता से मिश्रा-जी द्वारा जुटाए सांसारिक भोग की वस्तुओं को निहार रहा था।
'इस सांसारिक जीव ने बहुत प्रसिद्दि एवं धन कमाया है। यह निश्चय ही एक प्रभावशाली व्यक्तित्व का स्वामी हैं। इसकी मृत्यु के प्रश्चात यह संसार दुःख में डूब जाएगा।', शंखनाद ने चुप्पी तोड़ते हुए कहा।
'यह संसार कभी किसी का सगा नही हुआ है भ्राते! इस जीव की साँसों के समान ही इसके द्वारा अर्जित किया हुआ धन, मान और यह सांसारिक वैभव मिटटी में मिल जाएगा।', सिंघनाद की दर्शिकनिकता में भी खीज की बू आ रही थी। मिश्रा जी दम-तोड़ने का नाम ही नही ले रहे थे।
'देखना मेरा कथन सत्य प्रमाणित होगा। यह संसार शोकाकुल होकर त्राहि-त्राहि करेगा।'
'यह तो समय ही बताएगा की कौन-सत्य है।', यह कहते हुए, सिंघनाद ने शर्त लगाने का प्रस्ताव रखा। मिश्रा-जी तो अब मरे या तब, कम से कम यमदूतो के मनोरंजन का ही कुछ जुगाड़ हो। जब शंखनाद ने इस शर्त को जीवन-मृत्यु पर एक उपहास बताया तो, सिंघनाद को उसे समझाते देर नही लगी की, यह निरा मानव भी तो धरम की आड़ में क्या क्या गुल खिलाता है। कभी नैतिक मूल्यों का माखोल उडाता है तो कभी ईश्वर का, ऐसे में इस तुच्छ सी शर्त से भला कौन सा पहाड़ टूट पड़ेगा, और कुछ अनहोनी हुई भी नही। थोडी ही देर में मिश्रा-जी के प्राण-पखेरू उड़ गए। मिश्रा-जी की आत्मा के साथ सिंघनाद और शंखनाद ने यमलोक की और प्रस्थान किया। इस प्रकार धरती पर आकर आत्माए लाने का कार्य तो वो युग युग से कर रहे थे, परन्तु उन्हें इस बात का तनिक भी ज्ञान नही था की इस बार वो एक मुसीबत को अपने साथ ले जा रहे हैं।
यमलोक में कुछ दूसरा ही दृश्य चल रहा था। अपने स्वर्ण सिंहासन पर यमराज विचारमग्न मुद्रा में बैठे थे। उन्ही की बगल में अपना लेखा-जोखा लिए चित्रगुप्त खड़े थे। मुद्दा कोई मामूली मुद्दा नही था। चार युगों में पहली बार ऐसा हुआ था की चित्रगुप्त को अपने लेखे-जोखे पर संदेह हुआ हो। आज तक जैसा लेखे-जोखे ने हिसाब लगाया, वैसा सबको फल मिला। संसार के एक एक प्राणी के कर्मो का हिसाब इस लेखे-जोखे में विस्तार से रखा गया था। किसी भी प्राणी की मृत्यु पर उसके द्वारा किए गए कर्मो के हिसाब से उसे स्वर्ग अथवा नरक में जाना होता था। आज तक इस हिसाब में न तो कोई गड़बड़ हुई और न ही किसी को तिल-मात्र का भी संदेह, परन्तु आज परस्थिति विकत थी। चित्रगुप्त स्वयं अपने लेखे-जोखे के विपरीत जाना चाहते थे, और यमराज इसके विरुद्ध थे। सभी फसाद की जड़ थी, मिश्रा-जी की आत्मा जो किसी भी क्षण यमलोक पहुँच सकती थी।
हिसाब के अनुसार तो मिश्रा-जी ने कभी कोई दुष्कर्म नही किया था। सभी प्रकार से सांसारिक व्यसनों से मुक्त सफल और शांत जीवन जीने वाले को चित्र-गुप्त का मन स्वर्ग भेजने को गंवारा नही हो रहा था। यमराज को इसके पक्ष में कोई प्रमाण नही मिल रहा था।
'यहाँ इस जीव के खाते में कोई पाप नही लिखा है चित्रगुप्त!', यमराज ने फिर से वही प्रशन दोहराया जिसका कोई संतोषजनक उत्तर उन्हें अभी तक नही मिला था।
'महाराज! उसे कभी कोई पाप करने का समय ही नही मिला। वह बड़ी तल्लीनता से अपने तरकश में जहरीले बाण संजो रहा था। मुझे इस बात में कोई संदेह नही हैं की, यदि इस प्राणी को धरती पर कुछ वर्ष और जीवत रहेने दिया जाता तो प्रलय मच सकता था।', मिश्रा-जी की अल्पायु में मृत्यु की गुत्थी अभी तक सबके लिए एक पहली बनी हुई थी। चित्रगुप्त इसे परम-पिता का गुप्त संदेश मान रहे थे तो यमराज मात्र एक संयोग।
'ऐसी कौन सी विद्या अर्जित की है इस प्राणी ने?'
'महाराज! संसार में इस विद्या को ऍम बी ऐ के नाम से जाना जाता हैं। यूँ तो भेड़-चाल से प्रभावित होकर समाज का एक बड़ा वर्ग इस विधा को अर्जित करता है, परन्तु रोहन मिश्रा जैसे कुछ ही प्राणी इसकी अलोकिक एवं विनाशकारी शक्तियों के सच्चे स्वामी बन पाते हैं। साधारण सा दिखने वाला यह ज्ञान मानव मात्र में चाणक्य की कुटिलता, सूर्य सा तेज, शकुनी की वाक्-पटुता और रावण सा दुसाहस भर देता हैं। एक सामान्य प्राणी तो इस डिग्री से मिलने वाली नौकरी की चकाचोंध में समस्त शक्तियों को अर्जित करने से चुक जाता हैं, परन्तु यह जीव तो पूर्णतः पारंगत हो चुका है। संभवतया पृथ्वी को विनाश से बचाने के लिए ही परम-पिता ने इस जीव को अल्पायु में मृत्यु का श्राप दिया है।', चित्रगुप्त ने फिर से अपना पक्ष रखा।
कुछ देर तक सोच-विचारने के बाद यमराज ने कहा, 'यह श्राप है या वरदान यह तो समय ही बताएगा, परन्तु हम स्वर्ग-लोग की शान्ति के साथ किसी भी प्रकार का खिलवाड़ नही कर सकते। ना ही हम इस जीव को बिना कोई पाप किए नरक-लोक में भेज सकते है। अतः इसे यमलोक में ही कुछ समय तक रखा जाए। जब तक इसका भविष्य निर्धारित नही होता हैं, हमे ही इसकी पूर्ण जिम्मेदारी लेनी होगी।', यमराज अपना निर्णय सुना चुके थे। (... क्रमशः)
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Kab aa raha hai baaki ka part??
ReplyDeleteNagP, baaki ka part likhiye jaldi se :)
ReplyDeleteEk exam hai Wednesday ko, remaining part uske baad :P
ReplyDeleteThanks for reading :)