बंद अंधेरे कमरे में पप्पू अपने पलंग पर लेटा न जाने कौनसे खयालो में डूबा था। रात थी जो कटने का नाम नही ले रही थी और कमबख्त सुबह आने का। करवटे बदलते बदलते पप्पू ने पिछली कई राते काटी थी, परन्तु यह रात तो मानो द्रोपदी के चीर के समान खिचती ही चली जा रही थी। खिसियाते हुए उसने फिर से अपने सेल-फ़ोन पर समय देखा और अंदाजा लगाया की अभी भोर होने में बहुत समय शेष हैं। थक-हार कर पुनः सोने के निरथर्क प्रयास करने से पूर्व उसने सेल-फ़ोन का अलार्म चेक किया, कहीं उसकी आँख न लग जाए और वो सोता ही रह जाए। इस दिन को वो भला कैसे भूल सकता हैं। १४ फ़रवरी यूँ तो एक सामान्य दिन ही है, जिस दिन न देश आजाद हुआ गया था और न ही सविधान लिखा गया था। फिर भी इस दिन का महत्व किसी भी नौजवान के लिए उतना ही है, जितना किसी स्वंत्रता सेनानी के लिए पन्द्रह अगस्त का। वैलेंटाइन दिवस को समस्त संसार में प्यार की याद में मनाया जाता हैं। प्रेमी युगल अपने प्रेम का इजहार करते हैं, साथ में समय बिताते है और खुशिया मनाते हैं। इस दिन की बात ही कुछ निराली है।
भोर होने की आस में रोशनदान पर नजर गडाए पप्पू पुनः विचारो के भंवर-जाल में खो गया। इसी दिन का तो वह पिछले एक सप्ताह से प्रतीक्षा कर रहा था। यदि यह कहा जाए की इस दिन का इन्तजार उसे कई महीनो से था तो भी अतिशयोक्ति न होगी। कॉलेज में प्रथम वर्ष तो सेनिअर्स की सेवा और रैगिंग में ही निकल गया। कब परीक्षाये आई और कब चली गया, पता ही नही चला। प्रारम्भ में अनजाना लगने वाला यह हॉस्टल और नया शहर मानो उसके जीवन के अभिन्न अंग हो गए। सकुचाते हुए अनजान लोगो से बातचीत का सिलसिला एक बार आरम्भ हुआ तो पूरे हॉस्टल की दोस्ती के बाद ही रुका। बंगाल वाला भट्ट हो या दिल्ली का शर्मा, अब तो सब उसके मौज मस्ती के साथी बन चुके थे। सबने मिलजुल कर अध्ययन भी किया तो मस्ती भी खूब मारी, परन्तु लड़कियों के मामले में बेचारा पप्पू पिछड़ गया। भला लखीमपुर जैसे छोटे से गाँव में कहाँ उसे 'को-एड' का सोभाग्य मिलाता? जहाँ उसके कॉलेज के मित्रगन अपने स्कूल के समय से ही 'अस-ऍम-अस' की दिव्य शक्तियों से अवगत थे, वहाँ बिचारे पप्पू को तो इन सब हथकंडो की भनक भी नही थी। इसका यह अभिप्राय नही हैं की कभी पप्पू ने किसी लड़की की तरफ आँख भी उठाकर नही देखा, बस कभी बात-चित का मौका नही मिला।
कॉलेज में अध्ययन के दौरान उसने बहुत कुछ सिखा, फिर भी अपने रसिक मित्रो की बराबरी कहाँ कर पाता। हॉस्टल की मस्ती के साथ साथ उसके मित्रगन कॉलेज के बगल के पुष्प-उद्यान में भी समय बिताते थे, शहर के बाहर के थिएटर में अपनी गर्ल-फ्रिएंड्स के साथ सिनेमा देखते थे, और बेचारा पप्पू मन ही मन कुडता रहता था। एक अदद लव स्टोरी बनाने के उसने भी भरसक प्रयास किए। कभी डांस सीखने के बहाने से तो कभी नोट्स लेने के बहाने से, जब भी उसने किसी सुंदरी से संपर्क करना चाहा, तो मानो जुबान को सांप डस गया। शब्द रुक गए, धड़कन बढ गई और पसीना छुटने लगा।
पप्पू के दोस्तों ने भी कई यतन किए। उसे सिनेमा दिखाया, किसी भी लड़की से बात करने के लिए वार्तालाप लिख के दिए, हॉस्टल में प्रयोग करवाए, परन्तु हाय रे फूटी किस्मत, पप्पू का संकोच जस का तस् रहा। थक हार कर सबने उसे उसके हाल पर छोड़ दिया और अपने अपने जीवन में व्यस्त हो गए। एक बार फिर से यह शहर उसके लिए पराया हो गया।
अचानक पप्पू के भावनाओ का प्रवाह बाहर से आने वाले शोर से टूटा। लगता है जैसे पूरा हॉस्टल करवटो में रात काट रहा हैं और भोर की पहली किरण की राह देख रहा हैं। हॉस्टल के बाकी लोगो का ख़याल आते है उसने तुंरत उठने का निश्चय किया। उसके पुराने मित्र अब उसके मित्र कहाँ रहे थे, सभी अपने अपने जीवन में अपनी अपनी गर्ल-फ्रिएंड्स के साथ व्यस्त थे। इससे पहले की उसे फिर से न चाहते हुए भी शर्मा और भट्ट से नजर मिलनी पड़े, उसने मुहं अंधेरे ही हॉस्टल से निकल जाना उचित समझा।
इस तरह सबसे नज़रे छिपाए हॉस्टल से निकल जाना भी अब तो नया नही था। पप्पू के गहरे दोस्त भट्ट और शर्मा की प्रेम कहानिया दिन दुगनी रात चोगनी तरक्की कर रही थी। वो दोनों ही अब अपना समय अपनी-अपनी प्रेमिकाओ के साथ ज्यादा बिताते थे। जब भी उन्होंने पप्पू को साथ में ले जाकर अपनी प्रेमिकाओ से मिलवाना चाहा, पप्पू का लड़कियों के प्रति भय राह का रोड़ा बन गया। धीरे धीरे पप्पू के सबसे अच्छे दोस्त ही उसका मजाक उडाने लगे। 'Pappu can't dance saala' गाने ने तो जैसे आग में घी का काम किया। जिसे देखो वह पप्पू को देख कर यही गाना गाता, और बेचारा पप्पू चाह कर भी कुछ नही कर पाता। कभी अपने आप को अपने कमरे में बंद किया तो कभी लाइब्रेरी में, परन्तु इस तनाव ने कभी उसका साथ नही छोडा।
इसी उधेड़-बुन में वह बहुत दूर आ गया था। हॉस्टल भी पीछे छूट गया और भयावह अंधकार भी। सुहानी पवन से अठखेलिया करती सूर्य की प्रथम किरणे अलोकिक ऊर्जा का संचार कर रही थी। रात्रि के घोर अंधेरे से निकल कर मानो सभी पेड़-पौधे और जीव-जन्तु अटल श्रद्धा के साथ सात अश्वो के रथ पर व्योम की सेर करने वाले सूर्य देव की स्तुति कर रहे थे। पक्षी अपने घोंसलों को छोड़ नए उत्साह के साथ उड़ रहे थे और सड़क पर चहल-पहल भी धीरे धीरे बढ रही थी। दोपहर को जो शहर धूल मिटटी की गर्द में सना अपने दुर्भाग्य पर करुनादायी रुदन करता है, वह मानो एक निश्चल बालक के समान अपने ही खेल में मुग्ध फ़रवरी के हलके जाडो और धूप का आनंद ले रहा था। पप्पू भी इन सबसे अछुता न रहा। उसके रात भर की थकान छू-मंतर हो गई और वह नए उत्साह के साथ अपने गंतत्व की ओर बड़ने लगा।
रह रह कर उसके मन में निकट भविष्य में घटने वाली घटनाओ को लेकर रोमांच जाग रहा था। आज उसे एक कठिन कार्य जो करना था। जैसे ही उसकी नजर सड़क के किनारे बैठे फूल-वाले पर पड़ी, उसने सुर्ख लाल रंग का गुलाब खरीदने निश्चय किया। गुलाब खरीदते हुए अनायास ही उसका ध्यान भट्ट और शर्मा की और चला गया। कितने अच्छे दोस्त थे वो दोनों पप्पू के, परन्तु सब पीछे छुट गया। पप्पू को अचानक अपने बचपने पर हसी आ गई। यह उसकी ही तो मन-गनत कहानिया थी जो उनके बीच दरार बन गयी थी। उन्होंने कब पप्पू को अपने से अलग किया था? इसी नयी सुबह की स्फूर्ति कहा जाए या वैलेंटाइन दिवस का जादू, रह रह कर पप्पू का ह्रदय अपने पुराने मित्रो से मिलकर पुराने गिले-शिकवे दूर करने को करने लगा। उसके कदम वापिस मुड़ने को ही थे की उसका सेल-फ़ोन बजने लगा। यह उसके द्वारा लगाया गया अलार्म था। यकायक वह यथार्थ के धरातल पर लौट आया, अब सब कुछ पीछे छुट चूका था। उसका बचपना अब उसका दंभ बन चूका था। पुनः अपने द्वारा झेले हुए विषाद को याद करके उसके कदम उसके गंतत्व के लिए चल पड़े। सुबह की धूप अब चुभने लगी थी।
जिस प्रकार बिना इलाज के एक छोटा सा फोड़ा भी नासूर बन जाता है, उसी प्रकार पप्पू का संकोच उसके अवसाद का कारण बना। एकांत में समय गुजारते गुजारते न जाने कौन कौन से प्रश्न उसे झंझोरते रहे। कभी अपने संकोच पर तरस आया तो कभी जीवन के उद्देश्य पर सवालिया निशाँ उभर आए। अध्ययन से धीरे धीरे ध्यान जाता रहा और वह पाता नही किस अनबुझी पहेली को सुलझाने के लिए नए नए मार्ग ढूढने लगा। यह चंचल मन भी कभी एक पथ पर एकचित नहीं हो पाता। यही तनाव उसे न जाने किन किन गलियों में ले गया। कभी उसने नशे में जिंदगी तलाशी तो कभी लाल-बत्ती और घांस-मंदी की आवारा गलियों में। काली अँधेरी रात उसकी दोस्त हो चली और दिन के उजाला मानो जन्मो का दुश्मन हो गया। अपनी ही उधेड़-बुन में व्यस्त एक एक करके सभी व्यसन उसने अपनाए और उतनी ही शीघ्रता से छोड़ भी दिए। कभी आत्म-ग्लानि बीच में आ गयी तो कभी पुराने आदर्शो ने उसके भटकते हुए कदमो पर लगाम लगा दी। अकेलापन फिर भी उसके साथ रहा। उसके हॉस्टल के साथियो ने भी एक एक करके उसपर ध्यान देना छोड़ दिया, और पप्पू अपने लिए नए नए रास्ते खोजने में लगा रहा। लगभग दो महीने पहले उसकी मुलाकात रघुनाथ जी से हुई और तब से उसके अशांत मन को एक सहारा मिला।
पप्पू रघुनाथ जी से अपनी पहली मुलाकात के बारे में सोचता हुआ, फूल-बाग़ पहुँच गया था। वहां और भी कई नव-युवक खड़े थे। कोई रंगीन वस्त्रो में था तो कोई कड़ी के कुरते में. छोटे छोटे समूह में चर्चाओ का दौर चालू था। रोमांच और उत्साह की लहर से बाग़ लबालब हो रहा था। जिस देश के नव-युवक इस उत्साह के स्वामी होते है, उस देश की तरक्की में किसी को भला क्या संदेह।
पप्पू ने भी एक दो नव-युवको से बातचीत की और तभी रघुनाथ जी वही बने हुए छोटे से मंच पर माइक ठीक करके कुछ बोलने लगे।
"मेरे राष्ट्र की अनमोल धरोहर, मेरे राम-राज्य की पराक्रमी सेना! आज समय आ गया है जब पश्चिम-वाद की चरण-वंदना करने वाला यह समाज हमारे राम-राज्य की वास्तविक शक्तियों से अवगत होगा। संसार में शालीनता की प्रतिमा माने जाने वाले हमारे विराट देश की प्रतिष्ठा पर प्रहार करने वाले और दिखावे की दोगली रास लीला रचाने वाले युवको को आज हमारी श्री-राम सेना वह सबक सिखायेगी की उनके ह्रदय में नारी के प्रति सम्मान और हमारे धरम के प्रति निष्ठा फिर से जाग्रत होगी।"
रघुनाथ जी के स्वर एक नए जोश का संचार कर रहे थे। सब तलिन्नता से उनकी विचार-गंगा का आनंद ले रहा था, और एक बार फिर पप्पू का ध्यान कहीं खो गया। उसे कुछ अजीब लग रहा था। मन में शंका उठ रही थी अपने इस कदम के विपरीत। सब प्रकार के व्यसनों से भी जब उसे शांति नहीं मिली थी तो धर्म के इस मार्ग ने ही तो जीवन में एक उद्देश्य दिया था। उसके साथ श्री-राम सेना में जुड़ने वाले युवक अपने अलग अलग स्वार्थ को साधे बैठे थे। किसी की लिए यह सिर्फ एक मनोरंजन का साधन था तो किसी के लिए जीवन का एक मात्र लक्ष्य। कोई समाज से बेइज्जत होकर इस सेना का हिस्सा बना था तो कोई कुछ काम न होने की त्रासदी में। किसी के ह्रदय में समाज में भेद-भाव को लेकर आक्रोश था तो किसी के ह्रदय में कुछ कर गुजरने का जज्बा। मनोभाव कुछ भी हो सेवा तो राम की है, ऐसा रघुनाथ जी कहते थे। परन्तु आज उसे यह सब मिथ्या लग रहा था, एक छलावा जो वह स्वंय के साथ कर रहा था। आत्मा एक बोझ में दबी जा रही थे, दम घुटने को था।
तभी 'जय श्री-राम' का स्वर गूंजा और पप्पू पुनः यथार्थ के धरातल पर आ खडा हुआ। देखते ही देखते सभी युवको ने अपने अपने गुलाब के पुष्प को निर्दयीता से कुचल दिया। रघुनाथ जी के साथी सबको हॉकी, चैन इत्यादि वितरित कर रहे थे। कुछ दिनों पूर्व की गयी घोषणा के अनुसार आज का कार्यक्रम निर्धारित हो चूका था। छोटे छोटे समूह में युवको को पश्चिमवाद पर प्रहार करने का आदेश मिल चूका था। रास्ते में आने वाले किसी भी प्रेमी युगल को अच्छा सबक कैसे सिखाया जाये, यह किसी को बताने की आवश्यकता नहीं थी। सभी को पता था की क्या करना हैं। सबका जीवन एक उद्देश्य की प्राप्ति में लगा हुआ था। इसी उद्देश्य का ध्यान आते ही उसने भी आगे बड़कर एक हॉकी अपने हाथ में ले ली, और थियेटर की और जाते हुए समूह का हिस्सा बन गया। आखिर भट्ट और शर्मा वही तो होंगे। जय श्री-राम के सिंह-नाद के साथ नव-युवको की टोलिया अलग अलग दिशा में जाने लगी। दोपहर होने को थी। पक्षियों का स्वर गाडियों के शोर में डूब रहा था। सुबह की सुहानी धूप और पवन के झोंके कहीं खो गए थे। कुछ क्षण पूर्व अठखेली करता शहर अपने दुर्भाग्य पर अंतर्नाद कर रहा था, और पप्पू 'जय श्री-राम' का नारा लगता हुआ अपने समूह का प्रतिनिधित्व कर रहा था। आज पप्पू को अपने अवसाद से मुक्ति पाने का मौका जो मिला था।
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nice one..may be u could have let pappu bump into bhatt and sharma on the V Day. His predicament is that situation (should-I-thrash-my-friends??) could also have been a twister ;)
ReplyDeletebaaki bohat badiya...noukri nahin mil rahi to kahinikaar hi baan jao..acche paise milenge [:p]
I considered Pappu meeting his friends, but couldn't think of a reasonable ending. Anyways my intention was to comment on the move by 'Ram-Sena' and the Manglore Pub's incident. :)
ReplyDeleteGreat story...!!!
ReplyDeleteTitle is misleading ....:P .
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