Tuesday, January 13, 2009

कहीं आप...

यह समय है सवाल पूछने का, जिसे देखिये आपके लिए एक सवाल लेकर हाजिर हैं। कहीं चुनाव का सवाल है तो कहीं भ्रष्टाचार का, कहीं कम कपडो का सवाल है तो कहीं दो वक्त के अनाज का। और अगर आप इन सब बातों से ऊपर उठकर सिर्फ़ अपने में ही मगन है तो सवाल है प्रमोशन का, नौकरी का, छोकरी का, कमाई का और तो और खर्चे का, तो ऐसे में भला आप क्यूँ मेरे इस नए सवाल को तवज्जो देने लगे? तो जनाब मेरी बात ध्यान से सुनिए और सोचिए क्यूंकि यह सवाल जाने-अनजाने आप अपने आप से कई बार पूछ चुके है और झुठला चुके है इसके अस्तित्व को, परन्तु यह एक यक्ष प्रशन है जिसका जवाब में भी खोज रहा हूँ। तो आइये मिलकर यह गुत्थी सुलझाते हैं।

हाँ तो सवाल यह है की कहीं आप बुडे तो नही हुए जा रहे। समय का चक्र तो निरंतर चल रहा है, दिन पर दिन और वर्ष पर वर्ष बीते जा रहे है, परन्तु कहीं ना कहीं आप नीरसता तो नही महसूस कर रहे। आइये जरा इस व्याधि के अन्य लक्षणों पर एक नजर डाल ले।
* कुछ करने का मन नही करता है।
* बार बार पुरानी एल्बम लेकर बैठ जाते है और निहारते है अपने बीते हुए दिनों को।
* परम-सुख देने वाला इन्टरनेट बोरिंग लगने लगता है।
* सभी जोक्स सुने-सुनाये लगते है।
* रह रह कर यही सवाल मन में दौड़ता है, 'अब क्या?', 'अब क्यूँ?'।
* स्वप्न देखने की शक्ति क्षीण हो चुकी है।
* आलस्य में अब वो सुख नही मिलाता।
* कहीं आने-जाने का मन नही करता।
*लोगो से मिलाना गवांरा नही होता।

यदि आप उपरोक्त लक्षणों में से किसी से भी ग्रस्त है तो संभल जाइये, यह आपके बुडापे का संकेत है। कॉलेज के दिनों में फन्ने-खां बनकर जिंदगी को सिगरेट के धुंवे में उडाने वाले मस्त-मौजी प्राणी को समय की काली-नजर लगती जा रही है। कभी भविष्य अन्धकार-मय दिखता है तो कभी इतिहास सुहाना लगने लगता है, और हम भूल जाते है हमारे आज को। ज्यादा भावुक होने अथवा परेशान होने की आवश्यकता कतई नही है, क्यूंकि प्रत्येक समस्या का हल सम्भव है। यह रहे आपके खोये हुए उत्साह को पाने के लाजवाब नुस्खे:

* सबसे पहले तो इन्टरनेट की दैविक शक्तियों का पुनः पूजन करने लगिए। यही वो इन्टरनेट है जिसके द्वारा आपने घंटो अपने रूमानी हर्दय को सुख दिया है। बात चेटिंग की हो या ऑरकुट पर समय नष्ट करने की, यह इन्टरनेट ही आपको आपके असली दर्शन करवा सकता है। तो सोचना क्या है, एक बकवास सा ईमेल लिखिए जिसमे कोई बचकाना हरकत हो, और भेज दीजिये अपने मित्रो को। परवाह ना करिए उनके रेस्पोंस की, कहीं न कहीं वो भी इस नीरस जिंदगी से उब रहे है।

* यह समय है गोविंदा और मिथुन की फिल्म्स देखने का। जल्द से जल्द अपने डेविड-धवन कलेक्शन में से एक बे-सर-पैर की फ़िल्म देख डालिए। जीवन के अर्थ को समझाती, गरीबो को करोड़पति बनाती और भरी-भरकम शरीर वाले हीरो की फ़िल्म देखने वाले भी भला इस विकत प्रश्न से बच पाए है, जो आप एक असफल प्रयास करना चाहेंगे। यह वक़्त है, कादर-खान के दो-मतलब वाले भाषण सुनकर मुस्कुराने का, अनु-मलिक के सेक्सी गाने गुन-गुनने का और गोविंदा के ठुमके लगाने का।

* अपने भविष्य का तो बहुत विचार कर लिया आपने, पुराने समय को निहार भी खूब लिया, अब कुछ आज में करिए। पुराने दोस्त लोग साथ नही तो कोई मलाल नही नए बन जायेंगे, वैसे भी पुराने लंगूर किस काम के थे? और यदि नए दोस्त और भी बड़े आइटम है तो भाड़ में जाने दीजिये उनको, और पूछिये अपने आप से की आपको क्या चाहिए।

* और अंत में सबसे कारगर नुस्खा, एक कागज लीजिये और इन प्रश्नों के उत्तर लिखिए:
मेरी उम्र:
मेरी ख्वाइशे:
मैंने जो आज तक कभी नही किया:
मैं जहाँ आज तक नही गया:
बस फिर क्या है, हो गए आप फिर से जवान। यह बुडापा तो एक मिथ्या है मेरे दोस्त, समय तो चलता रहेगा, परन्तु हमे बदल सके समय में इतना जोर कहाँ?

3 comments:

  1. pehle 4 paragraph padkar aisa lag raha tha ki tum kisi kamjori bhagane wali tablet ka advertisement kar rahe ho :P :P Hakim Nagpal Dawaakhana

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  2. ha ha ...I agree with KK ....
    Hakim Nagpal Dawaakhana " khe khe "......uske advertisement ki kaafi jhalak dikh rahi thi is article mein :D !!

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