Friday, December 19, 2008

हमारे प्यारे दिवाकर जी!

जीवन के लगभग सत्तर बसंत देख चुके दिवाकर जी की बागवानी में बड़ी रूचि है। बड़े चाव से वह सुबह-शाम अपने छोटे से बगीचे की देख रेख करते है। गुलाब, गुडहल, मोगरे, रात कली और चमेली के पौधों के अलावा कई देसी और परदेसी प्रजातियों के पौधे उन्होंने सहेज कर रखे है। इसी बगीचे के एक छोटे से कोने में तुलसी का एक गमला भी है जो उनकी स्वर्गवासी पत्नी की निशानी है। दिवाकर जी के धार्मिकता प्रतिदिन इस तुलसी के गमले में एक लोटा जल चडाने तक ही सिमित है, इस से ज्यादा भगवान् को जानने और मानने की आवश्यकता उन्होंने कभी नही समझी। तुलसी पर जल चडाने की प्रवति भी उनकी पत्नी के देहांत के बाद ही पनपी, मानो वो अपनी वामांगी के अधूरे वर्त का पालन कर रहे हो। उनकी पुत्रवधू, अपनी सास के समान ही, एक धार्मिक प्रवति की महिला है। तीज त्योहारों को आज भी दिवाकर जी के घर में पारंपरिक रूप से ही मनाया जाता है। दिवाकर जी का पुत्र सुरेश का कपडे का व्यसाय है और होनहार पोता विदेश में अध्यन कर रहा है।

बागवानी के अलावा, दिवाकर जी की रूचि कहानी सुनाने में भी बहुत है। मुहल्ले के सभी बच्चे प्रतिदिन शाम को दादा जी से कहानी सुनने आते है। दिवाकर जी के कहानिया किसी साहित्यिक डिग्री की देन नही हैं, बल्कि उनके ही जीवन के भूले-बिसरे अंश हैं। चालीस वर्ष की रेलवे गार्ड की नौकरी में उन्होंने बहुत दुनिया देखी है। अनगिनत लोगो के दिलचस्प किस्से उन्हें जुबानी याद है और जब कभी वह ये किस्से किसी को सुनाते है तो उनके चहरे का तेज देखते ही बनता है। आँखों की पुटलिया प्रसन्नता में ऐसे फूल जाती है मानो वो फिर से अपने पुराने समय में लौट गए हो। सभी उनका और उनके अथाह ज्ञान का सम्मान करते है। जीवन के इस मौड़ पर सुखी परिवार, सुंदर बगीचा, स्वस्थ शरीर और लोगो का मान मिले तो किसी और सुख की क्या चाह?

यूँ तो दिवाकर जी ने अपने जीवन के सभी खट्टे मीठे पलो को अपनी कहानियों में व्यक्त कर रखा है, फिर भी कुछ घटनाये ऐसी है जो आज भी उन्हें अचंभित कर देती है। ऐसा ही एक वाकया हुआ था पिछले बरस, जब उनका पोता, एक वर्ष विदेश में अध्यन करके ग्रीष्मावकाश में घर आया था। उनके पोते रमेश का विदेश जाना भी कुछ कम रोमांचक नही था। कुछ समय बैंगलोर में सॉफ्टवेर इंजिनियर की पोस्ट पर काम करने के पश्चात जब रमेश ने उच्च शिक्षा की अभिलाषा जताई तो सबने इसका विरोध किया। रमेश के पिता सुरेश बाबु का तर्क था की लगी-लगाई नौकरी छोड़ना बेवकूफी है, दूसरी और रमेश की माँ का दिल तो अपने पुत्र को पराये मुल्क भेजने के ख्याल से ही डूबा जा रहा था। रमेश का ननिहाल तो उसकी नौकरी लगते ही उसके विवाह के सपने देख रहा था। केवल दिवाकर जी ने ही अपने पोते के इरादों को प्रोत्साहित किया, और परिवार को भी माना लिया।

'अरे पढेगा-लिखेगा तो कुल का ही नाम रोशन करेगा, नौकरी में अच्छी तरक्की मिलेगी, चार पैसे ज्यादा कमाएगा, और तो और इसी बहाने विदेश की सेर भी तो कर लेगा।', दिवाकर जी सबको समझाने का प्रयास कर रहे थे।

'पर पिताजी मेरे दब्बू को तो खाना बनाना भी नही आता है, कैसे रहेगा मेरा बेटा अकेला अनजान लोगो को साथ।', ममता की मारी माँ अपने आप पर काबू ना रख पायी और दिवाकर जी का विरोध करने लगी।

'दब्बू दब्बू बोल कर मेरे शेर जैसे पोते को डिब्बा बना दिया है। सिर पर आती है तो इन्सान सब सीख जाता है। मुझे भी कहाँ खाना बनाना आता था, परन्तु जब सवाई माधोपुर के पास एक छोटे से गाँव में मेरा तबादला हुआ था और वहां रमेश के पिता सुरेश के लिए कोई स्कूल नही था तो एक साल मैं वहाँ अकेले ही रहा था। सुरेश की माँ तो मेरे स्वास्थ्य को लेकर चिंतित थी और मैं मजे से खाना बनाना सीख रहा था। एक दो बार अंगुलिया जली और ज्यादा नमक की सब्जी खानी पड़ी परन्तु जल्दी ही में तुम्हारी सास से अच्छा खाना बनाने लगा।', दिवाकर जी ने बड़े चाव से पुराने दिनों को याद किया।

'पर बाबू जी वहाँ बुरे लोगो के संगत में पड़ गया तो?', बेचारी ममता कहाँ इतनी जल्दी मानने वाली थी?

'अभी बंगलोर में क्या तुम आन्ठो पहर उस पर नज़र रखे हो? कुछ तो भरोसा करो अपने लाल पर?'

'और तो और विदेश जाएगा तो तुम्ही गर्व से सभी को कहती फिरोगी की मेरा दब्बू अमेरिका में पड़ रहा है।' अंततः रमेश की माँ भी मान गयी। उन्हें और सुरेश बाबू को जो कोई भी तर्क सही लगा हो, दिवाकर जी तो अपने पोते के विदेश यात्रा को लेकर उत्साहित थे। दादा की सभी अधूरे सपने पोता ही तो साकार करता है।

ईश्वर की कृपा से सब कार्य ठीक से संपन्न हुआ और रमेश एवं उसके दादा जी का सपना भी साकार हुआ। जिस दिन रमेश विदा हो रहा था, सभी उसे तरह तरह की सलाह दे रहे थे। कोई मन लगाकर अध्ययन को कहता था तो कोई स्वास्थ्य का ध्यान रखने को। रमेश के ननिहाल से बुरी संगत से दूर रहने की सख्त चेतावनी आयी थी। इन सबसे विपरीत दिवाकर जी ने रमेश को जीवन का सम्पूर्ण आनंद लेने की सलाह दी। 'बेटा जिंदगी से बेहतर और कोई टीचर नही होता।', दिवाकर जी से और कोई अपेक्षा भी क्या कर सकता था?

रमेश के विदा होते ही घर एक दम सुना सा हो गया। कितना भी समझाने के उपरांत भी रमेश की माँ का ध्यान उसी की चिंता में लगा रहता, उसके पिताजी तो अपने व्यवसाय में व्यस्त थे, परन्तु छुप-छुप कर उन्होंने भी कभी-कभी आंसू बहाए। दिवाकर जी, इन सब से विपरीत, बड़े गर्व के साथ कहते की उनका होनहार शेर उच्च अध्यन कर रहा है। कोई भी उनसे शिक्षा सम्बंधित राय लेने आता तो वो सीना चौडा करके कहते, रमेश से इ-मेल करवाके पता कर लेंगे। दिवाली आयी और होली भी निकल गयी, त्यौहार तो सभी मनाये गए परन्तु फीके-फीके। अंततः सबकी प्रतीक्षा की घड़ी शांत हुई और रमेश ने ग्रीष्मावकाश में एक माह के लिए घर आने की सूचना दी। रमेश की माँ का तो खुशी का ठिकाना नही था, और दिवाकर जी भी सबको रमेश के बारे में बताते नही थकते थे।

मई के प्रथम सप्ताह में रमेश सकुशल घर आ गया। जैसे ही उसने अपने दादाजी, माँ और पिताजी के पाँव छुए, उसकी माँ की एक चिंता तो समाप्त हुई। संस्कार इंसान का साथ कुछ ही समय में थोड़ी ही छोड़ देते है। होली, दिवाली से ज्यादा खुशिया ले आया था रमेश अपने साथ। कुछ दिन तो उसके सोने में ही निकल गए।

जैसे ही उसका जेट लेग समाप्त हुआ, शुरू हो गया उसकी कहानियों का सिलसिला।

'पिताजी वहाँ पर लोग दायें हाथ पर चलते है, और तो और दरवाजे भी उलटी डायरेक्शन में खुलते है।', जब जब रमेश अपने विदेश के किस्से सुनाता, सब बड़े चाव से सुनते। पड़ोस में रहने वाले छोटे बच्चो को तो यह विश्वाश नही हो रहा था की अमेरिका में बच्चे स्कूल जाने से पहले ही अंग्रेजी सीख लेते है। हड्डिया गला देने वाली सरदी और रुई के समान झक सफ़ेद बरफ के फोटू देख कर तो कोई भी एक बार तो दांतों तलो अंगुलिया दबा लेता। टेलीविजन पर तो लोगे ने यह सब कितनी ही बार देखा था, परन्तु अपने रमेश के किस्से सभी को रोमांचित कर देते। आने जाने वाले भी घंटो रुक कर रमेश से बातें करते, कोई अध्ययन के लिए सलाह लेता तो कोई उसके नए लैपटॉप को निहारता रहता। किसी की रूचि वहाँ के खाने में थी तो किसी की वहाँ की सरकार में। अध्ययन में तो रमेश अव्वल था ही।

परन्तु घर के एक कोने में उदास बैठे दिवाकर जी को पता नही क्या चिंता दिन-रात खाए जा रही थी। यह उनका बचपना था या बुडापा, परन्तु उन्हें धीरे धीरे लग रहा था की उनके प्रति लोगो की रूचि अब समाप्त हो रही थी। सब रमेश की ही सलाह चाहते थे, रमेश से ही मिलाने आते थे, और तो और आस-पास का कोई बच्चा अब उन्हें कहानी सुनाने की गुजारिश भी नही करता था। रमेश के विदेशी-अनुभवों के सामने उनके देशी किस्से फीके पड़ गए थे।

एक रात, खाने के समय रमेश अपने पिताजी को अमेरिका के बड़े-बड़े मॉल्स के बारे में बता रहा था, और कह रहा था की किस प्रकार लोग कही जाए बिना घर से ही इन्टरनेट से शौपिंग कर लेते है। ना चाहते हुए भी दिवाकर जी को सब सुनना पड़ रहा था। उनसे रहा नही गया और वो कह बैठे, ' सब्जी के लिए तो सब्जी-मंदी होगी या वो भी कंप्यूटर पर उगा लेते है?',

'अरे दादाजी, आप विश्वास नही करेंगे, वहाँ आलू-टमाटर पर भी एक्स्पिरी डेट लिखी होती है। लोग एक ही दुकान से सब समान खरीद लेते है, सब समान पेकद्द मिलाता है। बस वालमार्ट में जाओ, कार्ट उठाओ, समान भरो और आ जाओ।'

'उल्लू के पट्ठे! आलू प्याज तक ढंग से नही खरीद सकते।' , दिवाकर जी बडबडाते हुए टेलीविजन रूम में चले गए। रमेश के आने से टेलीविजन भी मानो उपेक्षित हो गयी थी, बिल्कुल दादा जी के तरह, किसी को उन दोनों परवाह नही थी। दिवाकर जी से तबियत पूछने के बजाय घर वाले अभी तक रमेश के किस्सों में उलझे थे। झुंझलाते हुए दिवाकर जी ने टेलीविजन की आवाज बड़ा दी, फिर भी सबके ठहाको की गूंज उनके कानो तक रह-रह कर पहुंचती रही। थक हार कर दिवाकर जी अपने कक्ष में सोने चले गए। सभी की आँखों के तारे दिवाकर बाबू की सुध लेने वाला अब कोई नही था।

अगले दिन सुबह-सुबह जब दिवाकर जी अपने छोटे से बगीचे में व्यस्त थे, उनका पोता उनके पास आ बैठा, और उनका हाथ बटाने लगा।

'दादा जी आपकी तबियत तो ठीक है ना।' रमेश ने मासूमियत से पूछा। पिछले एक वर्ष के समय में उसने जितना तकनिकी ज्ञान प्राप्त किया था, उस से अधिक अपने परिवार प्रति सम्मान और स्नेह सजोंया था। पहली बार जब वो विदेश में खाना बनाने लगा तो अनायास ही अपनी माँ की याद आ गयी। उसे प्रतिदिन तरह तरह की सलाह और उपदेश देने वाला वहाँ कोई नही था। पिताजी की डांट और दादाजी के प्यार को भी उसने रह रह कर याद किया था। होली और दिवाली पर घर पर बात करते करते उसका भी गला भर आया था। अपने घर और बैंगलोर में रहते हुए उसने कभी इन सबकी अहमियत नही समझी थी, परन्तु इस एक वर्ष ने उसे न जाने क्या क्या सिखा दिया।

'हाँ ठीक हूँ, थोडी बदहजमी हो गयी थी?', दिवाकर जी ने अनमने भाव से जवाब दिया और अपने पौधों की देख-रेख में लग गए।

'दादाजी पता है?', रमेश के विदेश के किस्से फिर से शुरू होने वाले थे।

'... वहाँ विदेश में सब भला ही कितना अच्छा हो, लेकिन आपके जैसे कहानी सुनाने वाला कोई नही था।', कौन विश्वाश करेगा की अपनी युवास्था के स्वर्ण-काल में कोई अपने बचपन के किस्से याद करेगा। एक पल को तो दिवाकर जी ने भी ध्यान नही दिया।

'... इस बार जाने से पहले में आपको कंप्यूटर युस करना सिखा दूंगा, फिर आप भी मुझे इ-मेल कीजियेगा।', उस छोटे से कस्बे में विडियो चेट का तो सपना ही निरर्थक था।

'... मैं भी आपको वहाँ के किस्से इ-मेल किया करूँगा।', और रमेश शांत हो गया।

अपनी ही सोच में डुबे दिवाकर जी को यह बात जैसे छू सी गयी। अपने बचपने पर उन्हें शर्म आने लगी, किस मुरख की तरह वो अपने ही प्रतिबिम्ब से होड़ कर रहे थे, अपने ही छाँव में पला बड़ा उनके जिगर का टुकडा उनकी आंखों का काँटा बन गया था। जिसकी याद में साल भर वो दरवाजे पर आँखे गडाए रहे, उसके ही आने पर उनका दिल बैठा जा रहा था। जिसके मधुर स्वर सुनने के लिए उनके कान तरस रहे थे, उसके ही शब्दों को वो कर्कश मान बैठे थे।

'हे सुरेश की माँ! यह मैंने क्या कर दिया?', भावुक होकर दिवाकर जी अपने अंतर्मन से प्रश्न किया, और उत्तर में मिली अपने ही ह्रदय से धिक्कार। अपने बचपने पर उन्हें गुस्सा भी आया और तरस भी। जीवन के सत्तर बसंत देखने के बाद भी अपने अन्दर छुपे दानव को वह पहचान नही पाये थे। अपने स्वार्थ और अहम् में अपने ही अंश के विरोधी बन बैठे। वो जितना इस बारे में सोचते उतना ही बुरा महसूस करते।

इन सब से बेखबर रमेश बड़ी तलिन्नता से गमलों में पानी दे रहा था। अंततः दिवाकर जी ने अपने भावो पर नियंत्रण करते हुए रमेश से पूछा, 'अरे तू कल कह रहा था की वहाँ आलू प्याज पर भी एक्स्पिरी डेट लिखी होती है। तू भी अपने दादा के समान फेंकू हो गया है।' दिवाकर जी ने मुस्कुराते हुए कहा।

'नही दादाजी सच बोल रहा हूँ, और तो और वहाँ पर यह सब पौधे भी वालमार्ट में मिलते है।'

'चल झूठे, अपने बुडे दादा का मजाक उडा रहा है। उसका बनिया का क्या कोई हनुमान है जो सब कुछ अकेले ही संभाल लेता है।'

'सच में दादा जी, मैं आपको इन्टरनेट पर दिखा देता हूँ।', रमेश ने अपना तर्क प्रस्तुत किया।

'अरे मैं तो मजाक कर रहा था। मुझे भी पता है यह सब, मैंने सब देखा है टेलीविजन पर। कभी कभी समाचार चैनल वाले अमेरिका की भी सैर करा देते है और वो भी मुफ्त में।', दिवाकर जी ने मुस्करा कर कहा।

रमेश भी खिलखिला कर हंस दिया, वो भी कहाँ अपने दादाजी को सिखाने चला था।

'आपको पता है दादाजी?', रमेश का नया किस्सा शुरू हो रहा था, और उसके दादाजी उसके भावो को निहार रहे थे। उत्साह में फूलती आँखों की पुटलिया, चहरे पर प्रसंता से अठखेली करते भाव और रोचकता का प्रवाह करती उसकी वाणी, यह सब आख़िर दिवाकर जी का ही तो प्रतिबिम्ब था।

आज भी जब दिवाकर जी उस दिन को याद करते है तो अपने किए पर पछतावा करते है। भले ही उनके जीवन के सात दशक बीत गए हो, जिंदगी आज भी कुछ न कुछ नया सिखा जाती है, और यह सब बन जाते है उनके कहानी संग्रह का एक हिस्सा। जीवन का इतना बारीकी से विश्लेषण करने वाले दिवाकर जी भला कैसे ना सबके प्यारे होंगे।

12 comments:

  1. bahut badiya mere sher. :) a very touchy conversation in the last few paragraphs and the whole story is very close to reality too :) other than that Two lines jinko pad ke majaa aa gaya. both from dadaji ke dil se..
    दब्बू दब्बू बोल कर मेरे शेर जैसे पोते को डिब्बा बना दिया है।
    सब्जी के लिए तो सब्जी-मंदी होगी, या वो भी कंप्यूटर पर उगा लेते है?', hahaha.. Dadaji is Dude yaar :)

    Ab Ramesh waapis kab ja raha hai US.. agli story me agar wo kuch gul khilaye US me to uspe thoda jyada prakash daalna :P

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  2. अच्छा लिखा है आपने। शुभकामनाएं।

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  3. आपका स्वागत है आपके और अच्छे लेख पढ़ने को मिलेंगे

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  4. बहुत सुंदर...आपके इस सुंदर से चिटठे के साथ आपका ब्‍लाग जगत में स्‍वागत है.....आशा है , आप अपनी प्रतिभा से हिन्‍दी चिटठा जगत को समृद्ध करने और हिन्‍दी पाठको को ज्ञान बांटने के साथ साथ खुद भी सफलता प्राप्‍त करेंगे .....हमारी शुभकामनाएं आपके साथ हैं।

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  5. हिन्दी ब्लॉग जगत में आपका हार्दिक स्वागत है, मेरी शुभकामनायें… एक अर्ज है कि वर्ड वेरिफ़िकेशन हटा दें, ताकि टिप्पणी में असुविधा न हो… धन्यवाद्।

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  6. हिन्दी चिट्ठाजगत में आपका हार्दिक स्वागत है.
    खूब लिखें,अच्छा लिखें

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  7. दिवाकर और रमेश के बारे में पढ़ना रोचक लगा, दिवाकर जी जल्द बलॉगर बन जाएं तो हम सब उनके किस्से सुनने को तैयार मिलेगें।

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  8. दिवाकर और रमेश के किस्से रोचक हैं। दिवाकर जी अगर बलॉगर बन जाएं तो उनके किस्से सुनने के लिए बहुत लोग तैयार मिलेगें।

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  9. बहुत अच्छा संस्मरण है रीतेश जी।
    लिखते रहिए और ऐसे ही मनोरंजक पोस्ट डालते रहिए।

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  10. आपका चिट्ठा जगत में स्वागत है निरंतरता की चाहत है

    मेरे ब्लॉग पर पधारें आपका स्वागत है

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  11. accha laga aapka blog phad kar...isi tarah likhte rahe..
    blog jagat main aapka swagat hai...

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  12. Jaldi hi main bhi Hindi lekhan ka prayaas karoonga!

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