Sunday, October 18, 2015

एक आम आदमी जो आम ही रह गया!

एक आम आदमी जो आम ही रह गया!

आम आदमी का जिक्र आते ही जहन मे  एक तस्वीर उभरने लगती है. एक सीधा साधा अपने काम से काम रखने वाला, सबसे डर  कर रहने वाला, एक ऐसा आदमी जो कभी अपनी बदनसीबी के बोझ के तले  दबा है या फिर किसी अमीर के लालच के तले।  जो कभी वोट बैंक के लिए छला  जाता हैं तो कभी Big  Billion  Day का ग्राहक बनने  के लिए।  जो कभी Indrani  के पतियों को गिनने मे  खो जाता है तो कभी दादरी मे  सत्य को समझ नहीं पता है. जो भी हो, कुछ आम आदमी ख़ामोशी से सब सह लेते है, कुछ आवाज उठाते है तो कुछ बस यूं ही शिकायत ही करते रह जाते है. उम्मीद की किरण तो तब दिखती है, जब उनमे से ही कोई आगे आकर सबके हित के लिए प्रयास करता है, सबको भरोसा दिलाता है की यदि उसे अवसर मिला तो वह परिस्थितयां परिवर्तित कर देगा. उसी विश्वास के साथ वह आम आदमी एक आम आदमी से एक जन प्रतिनिधि बन जाता है.

जब गांधी जी को South Africa मे  भेदभाव का सामना  करना पड़ा तो वही उम्मीद की किरण फिर से जगी और एक जन प्रतिनिधि अस्तितव  मे  आया।  एक आम आदमी जिसने मात्र शिकायत करने के अलावा कुछ करने का प्रण लिया और पुरजोर कोशिश की परिस्थितियों को परिवर्तित करने की.

वही दूसरी और Delhi  ने दो बार विश्वास एक ही आम आदमी में विश्वास दिखाया, आस लगाई की शायद एक सच्चा जन प्रतिनिधि उभरेगा , परन्तु दुर्भाग्य वश, वह आम आदमी मात्र एक आम आदमी ही रह गया. परिस्थितियों को परिवर्तित करने के बजाय शिकायते करने मात्र से अपने दायित्व का निर्वाह करने लगा :(

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