इस कहानी की शुरुआत हुई थी आज से कई वर्ष पहले जब सबके चहते दूरदर्शन चैनल पर Ariel Mr. Gold का प्रसारण शुरू हुआ था. यह बात उस समय की है, जब महुल्ले के इक्का-दुका घरो में television होता था. रात को ज्यूँ ही हिंदी एवं अंग्रेजी समाचार समाप्त होते, पूरा परिवार एक टक निगाहों से कभी रंगारंग 'सुरभि' का आनंद लेता तो कभी रोमांचक 'तहकीकात' का लुफ्त उठाता. उन्ही दिनों सिने जगत के प्रख्यात अभिनेता अनुपम खेर के साथ शुरू हुआ Ariel Mr. Gold का अनोखा सफ़र. अनुपम खेर अपने हाथ में माइक उठाये, हिंदुस्तान की गलियों में घुमते और राह-चलते आम-आदमी से कुछ प्रश्न पूछते, सही उत्तर देने पर एक सोने का सिक्का दिया जाता और दिया जाता Ariel Mr. Gold का ख़िताब.
ऐसा ही एक ख़िताब मिला था हमारे सुरेन्द्र जी को. सुरेन्द्र जी अपनी श्रीमती जी के आग्रह पर बेमन सब्जी लेने बाजार पहुंचे ही थे की उनकी और एक मजमा बढने लगा, गौर से देखने पर पता चला की अनुपम खेर जी सामने से आ रहे है, और आते ही उन्होंने सुरेन्द्र जी से एक सवाल पूछा, 'क्या आप बिना गिने बता सकते है की आपकी जेब में कितने रुपये है?', कुछ क्षण को तो सुरेन्द्र-जी को विशवास नहीं हुआ की वह अनुपम खेर के समुक्ख खड़े हैं. कुछ क्षण शांत रहने के बाद उन्हें अहसास हुआ की वह दूरदर्शन पर हैं, तभी हाथ में झोले का ख्याल आया और घर पर गुस्सा होकर बैठी श्रीमती-जी का और उनके भी गुस्से का गुब्बार फुट पड़ा, 'क्या बताओ अनुपम साहब, आज ही पगार मिली थी और श्रीमती जी ने पुरे पैसे हथिया लिए और मुझे पकड़ा दिया यह झोला और तेरह रुपये पचास पैसे, सब्जी लेन के लिए. तो बस ले-देकर यही तेरह रुपये पचास रुपये है मेरी जेब में.', और होना क्या था, उतनी ही रकम निकली सुरेद्र-जी की जेब से. तभी अनुपम खेर की जेब से एक सोने का सिक्का निकला, और उन्होंने बधाई देते हुए, सुरेन्द्र-जी को वह सिक्का थमा दिया, हाथ मिला-कर फिर से बधाई दी और दो-चार इधर-उधर की बातें करके अपने कारवां के साथ आगे बढ गए. सुरेन्द्र-जी अभी भी हक्के-बक्के खड़े थे, कभी अपने सोने को सिक्के को देखते तो कभी तेरह रूपये पचास पैसो को.
कहते हैं की जब विपदा आती हैं तो सगे-संबंधियों के साथ आती हैं, उसी प्रकार जब किसी इंसान का भाग्य जगमगाता हैं तो उसके साथ-साथ उसके सगे संबंधियों के घरो में भी उजियारा कर देता हूँ. उस एक सोने की सिक्के ने मानो, समस्त सिंह परिवार की किस्मत खोल दी. किसी को LUX में सोने का सिक्का मिला तो, किसी को ताज-महल चाय में चाँदी का चमचा. नुक्कड़ वाले बनिया ने तो सुरेन्द्र जी के छोटे भाई, नरेन्द्र को अपना हिस्से-दार ही बना लिया. नरेन्द्र जी का बस इतना सा काम था की जिस किसी वस्तु में कोई ऑफर चल रहा होता, उसकी पहले से छटनी करनी होती. जब ताज-महल चाय में चाँदी के चमचे का ऑफर चल रहा था तो नरेन्द्र जी ने चार पेकेट पहले ही छांट कर बता दिए थे. ऐसे ही किसी LUX के पेकेट की मजाल थी जो सोने के सिक्के के साथ किसी भी ग्राहक के हाथ पहुँच जाए, वो तो नरेन्द्र जी पहले ही बंद पेकेट देख कर बोल देते थे, की सिक्का हैं या नहीं.
समय गुजरा और कई सारे ऑफर आते और जाते रहे, सुरेन्द्र जी का नियमित बाजार जाना भी थमा नहीं. यूँ ही एक दिन सब्जी खरीदते खरीदते उनकी नजर 'कौन बनेगा करोड़-पति' के विज्ञापन पर पड़ी. मौके से उस दिन भी पहली तारीख थी और श्रीमती जी से झगडा भी हुआ था. विज्ञापन को देखते ही, सुरेन्द्र जी को अनुपम खेर के साथ बिताये चंद लम्हे ध्यान आ गए, और वो कुछ क्षणों की प्रसिधी भी. उनकी स्तब्ध आँखों में झांकता केमरा, अगल-बगल खुसर-फुसर करते लोग और हाथ में माइक लिए अनुपम जी, टीवी पर उनका बिताया वो वक़्त मनो फिर से लौट आया. तभी विचार बनाया की 'कौन बनेगा करोड़-पति' के माध्यम से पुनः उस पल को जिया जाए.
श्रीमती जी को अपने दिल की बात बताना था या घर में एक नया तूफ़ान आमंत्रित करना, इसका फैसला सुरेन्द्र जी आज टक नहीं कर पाए.
'सठिया गए हो. यह कोई उम्र है ऐसे ख्वाब देखने की?', श्रीमती जी का पारा सातवे आसमान पर था.
'अरे खुद अमिताभ जी भी तो मुझ से कई वर्ष बड़े है, वो भी तो बखूबी इस कार्यक्रम का सञ्चालन करते है... और यदि घर में चार पैसे आयेंगे तो तुम्हे भी तो ख़ुशी ही होगी.' सुरेन्द्र जी ने कोई तर्क रखने का प्रयास किया.
'हाँ हाँ सब पता है मुझे, एक बार दस मिनट के लिए टीवी पर क्या आ गए हो, अपने आप को बहुत बड़ा अभिनेता समझने लगे हों. पड़ोस की महिलाओ के सामने ऐसे अकड़ दिखाते हो, जैसे तुम अनुपम जी को सिक्का देकर आये थे'
'अच्छा तो यह बात है, तुम जलती हो मुझ से', अब तो सुरेन्द्र जी भी लाल-पीले हो रहे थे.
'जले मेरे दुश्मन, अपना नहीं तो कम से कम अपने शादी-शुदा बेटे की इज्जत का तो ख्याल करो. अपना मुन्ना वैसे भी कितना होशियार हैं दिन-दुनिया की खबरों में, मेरी मानो तो उसे ही भेज दो.' श्रीमती जी ने तुरुप का पत्ता फेंका था.
'हाँ, बात तो तुम ठीक कह रही हो, में आज ही गोल्डी बेटा को मनाता हूँ.', कुछ सोच विचार कर सुरेन्द्र जी मान गए.
गोल्डी आरम्भ से ही मेधावी रहा हैं. प्रथम श्रेणी में बी.काम किया और बैंक में नौकरी पा ली. इस संसार की समस्त माताओ के समान गोल्डी की माताजी का यह मत था की, गोल्डी न सिर्फ उनके परिवार के लिए, बल्कि समस्त कुल के लिए भाग्य-शाली हैं. जब भाग्य की रेखाए किसी मेधावी मानव के हाथ में घर बनाती हैं तो उसकी प्रगति को कोई नहीं थाम सकता. यही सब सोच विचार कर सुरेन्द्र-जी ने गोल्डी को भी मन लिया, और गोल्डी पहुँच गया प्रथम चरण पार करता हुआ, अमिताभ जी के समुक्ख, 'करोड़-पति' बनने के सपनो के साथ.
पूरा परिवार तल्लीनता से गोल्डी को टीवी पर देख रहा था, और वह एक के बाद एक सही जवाब दिए जा रहा था. सुरेन्द्र जी का सीना गर्व से फुला जा रहा था और उनकी श्रीमती जी के तो आँखों के आंसू नहीं रुक रहे थे. गोल्डी की पत्नी, नैना और दस वर्ष का पुत्र, गुड्डू भी पुरे परिवार के साथ 'कौन बनेगा करोड़-पति' का आनंद ले रहे थे. तीन लाख और बीस हजार जीतने के बाद गोल्डी ने हार मान ली, और अमिताभ जी से हाथ मिलकर लौट आया. सुरेन्द्र जी उसके निर्णय का समर्थन कर रहे थे तो घर की महिलाये और खेलने पर जोर दे रही थे. 'देखना मैं पुरे एक करोड़ जीत कर लूँगा', गुड्डू ने तभी यह प्रण लिया, और सब हसने लगे. आज एक बात तो सिद्ध हो गयी थी की सुरेन्द्र जी द्वारा जीते गए सिक्के की चका-चोंध अभी कम नहीं हुई थे. आज भी धन-लक्ष्मी सिंह परिवार के द्वार पर ही विराजमान हैं.
'कौन बनेगा करोड़-पति' के बाद तो जैसे टीवी चेनल्स पर Reality Shows की बाढ़ ही आ गयी. इनाम की रकम एक करोड़ से बढकर, कभी दो करोड़ हुई तो कभी दस करोड़. कभी सामान्य ज्ञान के आधार पर पैसा बांटे जाने लगा तो कभी फिल्मी ज्ञान पर. पूर्णतया किस्मत पर आधारित Deal or No-Deal ने भी लोगो को खूब धनवान बनाया. फिर प्रथा चली नाच-गाने की प्रतियोगिताओ की. चाहे 'सा रे गा मा' हो या 'डांस इंडिया डांस', अपने अपने हुनुर की हिसाब से कोई भी धन कमा सकता हैं, और कुछ नहीं तो एक मिनट टक कोई भी उट-पटांग हरकत करो, और 'Entertainment के लिए कुछ भी करेगा' से दस हजार रुपये जीत लाओ. बात उट-पटांग हरकतों तक ही सिमित रहती को ठीक था, परुन्तु अब तो गाली-गलोच करने पर भी कुछ युवा चेनेल्स प्रतियोगियों को कभी 'Roadie' बना देते हैं तो कभी 'Big-Boss' का पसंदीदा मेहमान.
सुरेन्द्र जी अब रिटायर्ड हो गए हैं. दिन भर टीवी ही देखते है. श्रीमती जी के तानो से बचने के लिए अब सुरेन्द्र जी ऊँचा सुनाने का बहाना बनाने लगे हैं. गोल्डी ने 'कौन बनेगा करोड़-पति' के पैसो से कार खरीद ली थी, अब उसी से बैंक जाता हैं. गोल्डी के चाचा नरेन्द्र जी का जादुई हाथ आज भी नुक्कड़ वाले बनिए का हजारो का मुनाफा कराता हैं. सबका जीवन मजे से चल रहा है, सिवाय घर के सबसे छोटे सदस्य, गुड्डू 'गोल्ड' सिंह के. वर्षो पूर्व बचपने में लिया गया एक करोड़ रुपये जीतने का संकल्प अब गले में फंसी हड्डी बन गयी है. सुरेन्द्र जी को तो पूरा विश्वास हैं की अनुपम जी द्वारा दिया गया सिक्का आज भी सिंह परिवार के लिए भाग्यशाली हैं और वह आज भी अपने पोते द्वारा करोडो रुपये जीतने का सपना संजोये हुए हैं.
प्रतिस्पर्धा की इस दौड़ में जब प्रत्येक परिवार अपने घर में डॉक्टर और इंजिनियर की चाह रखता हैं, वहीँ इन सब से विपिरित, सिंह परिवार की उम्मीदे गुड्डू के 'Reality Show' के विजेता बनने पर लगी हुई हैं. गोल्डी और नरेन्द्र जी तो गुड्डू के 'Roadie' बनने का सपना देखते हैं. बात सिर्फ सपने देखने तक ही सिमित रहती तो अच्छा था, परुन्तु गुड्डू को पूर्णतया तैयार करने के लिए, नरेन्द्र जी उसे नियमित वर्जिस करवाते हैं, और गोल्डी तरह तरह के 'Tasks'. गुड्डू के दादाजी, सुरेन्द्र जी के अनुसार सामान्य ज्ञान पर आधारित कार्यक्रम का दौर फिर से शुरू होगा, इसीलिए वह नियमित अख़बार पदकर गुड्डू के ज्ञान की परीक्षा लेते हैं. 'दस के दम' के प्रसारण के बाद से तो सुरेन्द्र जी ने 'कितने प्रतिशत भारतीय मानते हैं की....' जैसे सवाल पूछना भी आरंभ कर दिया हैं.
घर के पुरुषो के अत्याचार से पीत्रित गुड्डू अपनी माँ से ही प्यार और दुलार की अपेक्षा रखता हैं, पर हाय रे फूटी किस्मत. गुड्डू की माँ, नैना तो जैसे अपने पुत्र में एक उभरता हुआ सितारा देखती हैं. 'डांस नहीं तो सिंगिंग में ही चांस मार ले शायद', यही सोच कर नैना ने गुड्डू के लिए नृत्य एवं गायन की शिक्षा का प्रबंध किया हैं. गुड्डू द्वारा कहे गए प्रत्येक कथन को घर के सदस्य दस में से अंक देकर विश्लेषित करते हैं. नए नए प्रकार के 'Tasks' देकर उसके सामर्थ्य का समय समय पर अन्वेषण करते हैं. उसे 'Tips' दिए जाते है, बारीकी सिखाई जाती हैं.
शाम होते होते बेचारा गुड्डू थक हार कर अपनी दादी के समान शांत और सहमा हुआ सा बैठ जाता हैं. जब से सुरेन्द्र जी ने ऊँचा सुनने का नाटक रचना शुरू किया है, उनकी श्रीमती जी का तो जैसे शब्दों से मोह ही समाप्त हो गया हैं. जो जुबान सुरेन्द्र जी को ताने मारते मारते नहीं थकती थी, आज वही एक अनिश्चित कालीन मौन धारण किये हुए हैं. गुड्डू को 'Perfect TV-Material' बनाने की उठा-पटक में सब मनो गुड्डू की दादी के मौन को समझ ही नहीं पाए हैं.
गुड्डू का दुर्भाग्य उसका पीछा छोड़ने को राजी ही नहीं हैं. एक टीवी चैनल ने एक अनोखे 'Reality Show' का आरम्भ किया है, जिसमे अपने घर के बड़ो को चार-धाम की यात्रा करनी हैं. गुड्डू की दादी की तो सब आशाये बस अपने पोते पर ही लग गयी हैं. उन्होंने भी अपनी कमर कस ली है, गुड्डू को ऐसे ही किसी शो के लिए तैयार करने की. गुड्डू में भक्ति भाव, बड़ो के प्रति सम्मान, और संस्कार कूट-कूट कर भरे जा रहे हैं.
सबके सपनो में गुड्डू का सपना तो कहीं खो सा गया हैं, जैसा उसका बचपन. उसके संगी साथियो की कमी नहीं हैं, डांस क्लास में, म्यूजिक क्लास में और जिम में, सब जगह तो गुड्डू का नियमित आना जाना होता हैं. उसे ना ही चाह है डॉक्टर या इंजिनियर बनने की, उसे तो बस इंतज़ार है की वह जल्दी से बड़ा हो, और कटरीना कैफ जैसी किसी सुंदरी के स्वम्वर में जाए. यही है हमारे गुड्डू 'गोल्ड' सिंह की कहानी जो शुरू हुई थी Ariel Mr. Gold के साथ, तो क्या यह कहानी कभी किसी सुंदरी के स्वम्वर पर समाप्त होगी? चलिए कामना करते है, गुड्डू 'गोल्ड' सिंह के लिए!
Friday, January 15, 2010
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