इसे एक भटकते पक्षी की अन्तर-व्यथा कहा जाए तो अतिश्योक्ति ना होगी।
हजारो मिलो का फासला तय करके भी मंजिल की एक झलक हासिल नही होती, डूबते चदते सूरज के साथ चार पहर हाथापाई करके भी आशा की एक किरण नसीब नही होती। मैं भटकता ही रहा अपनी दोजख और जन्नत के दरम्यान जीत मिली भी तो जश्न के काबिल नही होती।
Thursday, November 6, 2008
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